रविवार, 24 मई 2015

सौ दिन में ‘आप’ तो बहुत बदल गए जी!


केजरीवाल जी,

नमस्कार। सरकार के सौ दिन पूरे होने पर आपको बधाई। किसी सरकार के काम का आंकलन करने के लिए सौ दिन काफी नहीं होता। आपके पास 17 सौ दिन से ज्यादा का वक्त अभी भी बचा है। चाहें तो आप जनता की उम्मीदों के बेहद करीब पहुंच सकते हैं। सौ दिन के दरम्यान दिल्ली कितनी बदली इसका आंकलन सभी पार्टियां अपने-अपने नजरिए से, नफा नुकसान को देखते हुए करेगी। लेकिन मुझे लगता है कि केजरीवाल जी आप बहुत बदल गए। आपका अंदाज, आपका व्यवहार बदल गया। उम्मीदों से कहीं ज्यादा। आपका यूं बदल जाना खटकने लगा है।

याद है, जब शपथ लेने के बाद आपने खुले मंच से विधायकों-मंत्रियों को नसीहत दी थी कि अंहकार मत करना। सबको साथ लेकर चलना। यकीन मानिए केजरीवाल जी, लगा था कि बदलाव शुरू हो चुका है। अंहकार को अब नया घर तलाशना होगा। सियासत से उसकी छुट्टी होने वाली है। लेकिन दूसरों की तो बात छोड़िए, आप ही अहंकार से अलंकृत हो गए। सत्ता के नशे में इतने मदहोश हो गए कि विरोधी पार्टियों का पब्लिक ट्रायल करते-करते मीडिया का पब्लिक ट्रायल करने पर उतारू हो गए। दुख भी हुआ और हंसी भी आई। आलोचकों को दूर रखना कमजोरी की निशानी है। आप बहुत कमजोर निकले।

आपका वो गाली वाला ऑडियो टेप जब मीडिया में आया था तो एकबारगी यकीन नहीं हुआ कि ये आवाज आप ही की है। आपने जिस आनंद कुमार, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ मिलकर पार्टी की नींव डाली थी, उन्हीं के लिए ये दिव्यवाणी थी। भड़ास निकालने का और भी तरीका हो सकता है। आप इतने असभ्य हो सकते हैं इसका अंदाजा नहीं था। ये गाली-गलौज तो कांग्रेस-बीजेपी, एसपी, बीएसपी, आरजेडी के कुछ तुच्छ नेताओं की भाषा है।

आपने साफ-सुथरी सियासत का वादा किया था। आप कांग्रेस-बीजेपी के आरोपी मंत्रियों से इस्तीफा मांगते फिरते थे। लेकिन आपके मंत्री पर फर्जीवाड़ा के आरोप लगे हैं। कहा जा रहा है कि आपके एक विधायक का भी सर्टिफिकेट फर्जी है। हैरानी की बात है कि मंत्री से इस्तीफा लेने के बदले आप बेशर्मी के साथ उनका बचाव कर रहे हैं। फिर आप बीजपी और कांग्रेस से कैसे खुद को अलग कह सकते हैं।

आप बात-बात पर उपराज्यपाल और केंद्र सरकार से राड़ ठान लेते हैं। केजरीवाल जी, आप मुख्यमंत्री हैं किसी प्रदेश का। विपक्षी पार्टी के नेता नहीं। इससे पहले भी दिल्ली में दूसरी पार्टियों की सरकार रही है। सामंजस्य बिठाना आपका कर्तव्य है। संवैधानिक रास्ते से आगे बढ़ने की जरूरत है। लेकिन पिछले सौ दिन में ज्यादातर वक्त झगड़ते हुए बीत गए।

चुनाव के वक्त आप कहते थे ये कर देंगे। वो कर देंगे। कुछ भी करना मुश्किल नहीं है। वादों की लंबी फेहरिस्त थी। जब मुख्यमंत्री बन गए तो कहने लगे कि आधा काम हो जाए तो काफी है। दिल की बात जुबां पर आ ही गई। इस मामले में भी आप दूसरी पार्टी के नेताओं से ज्यादा अलग नहीं हैं।

सिर्फ आप ही नहीं, आपकी सरकार के तमाम मंत्री, आपकी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं की जुबान से अहंकार की चाश्नी में डूबे शब्दे टपकते हैं। दंभ और अहं के बीच इंसान से इंसान का भाईचारा मुमिकन नहीं लगता है। मुझे डर है कि आपका वो पैगाम कहीं अधूरा न रह जाए। लोगों की वो उम्मीदें चकनाचूर न हो जाए।

एक आम आदमी (टोपी रहित)

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