गुरुवार, 26 जनवरी 2017

राजनीति का परिवारवाद

राजनीति में परिवारवाद का वटबृक्ष वक्त के साथ विशाल होता जा रहा है। कम्यूनिस्ट पार्टियों को छोड़कर कमोबेश हर दल में एक जैसी स्थिति है। सियासी दलों में हर डाल से एक बृक्ष बनता चला जा रहा है। ताज्जुब की बात ये है कि हर कोई राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ बोलता है, लेकिन इसे रोकने की बजाय हर नेता इसे विस्तार करने की दिशा में मौन सहमति दे देता चला जाता है। हर नेता दूसरे दल के परिवारवाद के खिलाफ जमकर बोलता है, लेकिन खुद आइने की तरफ देखने से कतराता है।

सच ये है कि लोकतंत्र में परिवारवाद कैंसर सरीखे है। लेकिन इसका इलाज करने की बजाय हर दल इसे स्वीकार करते हुए बढ़ रहा है। एक बार फिर परिवारवाद की चर्चा हो रही है। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में जिस तरीके से टिकटों का बंटवारा हुआ, उससे सवाल उठने शुरू हो गए हैं। खासकर जब परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पर तीखा तंज कसने वाली बीजेपी की लिस्ट में परिवारवाद को खाद-पानी दिया गया। बड़े नेताओं के बेटे-बहू, बेटी-दामाद और रिश्तेदारों को टिकटों से नवाजा गया।

संयोग देखिए कि जिस उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों को लेकर बीजेपी पर परिवारवाद का सबसे बड़ा आरोप लग रहा है उसी यूपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से अपने नेताओं से अपील की थी कि अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट न मांगें। लेकिन 10 दिन बाद जब टिकट तय करने के लिए बैठकों का दौर चला तो बड़े नेताओं के रिश्तेदारों के लिए पैरवी पत्र पेश कर दिए गए। उस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी भी थे। अपनी पार्टी के नेताओं को नसीहत देने वाले मोदी ने उस बैठक में क्या कहा, ये मुझे नहीं पता, लेकिन जब लिस्ट बाहर निकली तो उसमें से परिवारवाद टपक रहा था।

अब सवाल उठता है कि मोदी की नसीहत भी टिकट बंटवारे के वक्त क्यों बेअसर हो गई? आखिर क्यों ज़मीन पर झंडा ढोने वाले मुंह ताकते रह गए और बडे नेताओं के साहबजादे/ साहबजादियां के घर टिकट पहुंच गया? एक से दो बार खुद निर्वाचित हो जाने के बाद नेता क्यों अपने परिवारवालों के लिए राजनीति में आगे बढ़ने की सीढ़ी बनते चले जाते हैं? क्यों अपने बेटे-बहू, बेटी-दामाद और रिश्तेदारों की जगह पक्का करने की जुगाड़ में सबकुछ दांव पर लगा देते हैं?

दरअसल इसमें कहीं से भी दो राय नहीं है कि मौजूदा दौर में राजनीति को नफा-नुकसान की कसौटी पर कसा जाने लगा है। जाहिर है कि जब हिसाब-किताब लाभ और हानि को लेकर होगी। जब राजनीति करने वाले नेता खुद को फायदे और नुकसान के तराजू में तौलेंगे तो सेवा भाव का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। ऐसे में राजनीति में समाजसेवा की भावना को सूली पर टांग दिया गया है।

यानी बदलते दौर में संसदीय राजनीति का मिज़ाज ही मुनाफा कमाने वाली कंपनी सरीखे हो चुकी है। जिसका मकसद शेयर होल्डर्स को फायदा पहुंचाने से ज्यादा है नहीं। ऐसे में कंपनी चलाने वाले नेता, या फिर कहिए कि संचालक मंडल में शामिल बड़े-बड़े नेताओं के परिवार के सदस्य ही अगर शेयर होल्डर्स हो जाएं तो फिर हर्ज क्या है? सच यही है कि हर्ज सिर्फ उन्हीं कार्यकर्ताओं को होती है, जो टिकट के इंतजार में झंडा ढोते-ढोते अपनी जवानी को दांव पर लगा दते हैं और अंत में कुछ नहीं मिलता। बाकी तो उन्हीं ऊपर से टपकाए गए नेता नेता के पीछे-पीछे चल देते हैं। जिन बड़े नेताओं को परिवारवाद पसंद नहीं भी है, वे जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक, तमाम तरह के समीकरण में उलझकर रह जाते हैं।

इस दौर की राजनीति को देखकर किसे यक़ीन होगा कि देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने तो अपने बेटे को इतनी हिदायत देते हुए कहा था कि “मेरे नाम का कभी दुरुपयोग मत करना। जब तक मैं दिल्ली में हूं, तब तक यहां से जितनी दूर रह सकते हो रहना।” लेकिन संयोग देखिए की मौजूद गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे को सिटिंग विधायक का टिकट काटकर विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया गया है। राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को कहां से टिकट दिया जाए, इस बात को लेकर कई दिनों तक मंथन हुआ, आलम ये कि सबसे अंतिम में सीट फाइनल हुआ और नामांकन के आखिरी दिन पंकज सिंह ने पर्चा दाखिल किया।  

सिर्फ राजनाथ सिंह ही क्यों, बीजेपी के बड़े-बड़े दिग्गजों ने अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलवाई है। लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन को टिकट मिला। सांसद हुकूम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट दिया गया। सासंद सर्वेश सिंह के बेटे सुशांत सिंह को विधानसभा का उम्मीदवार बनाया गया। सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण को टिकट मिला। जबकि मोहनलालगंज से सांसद कौशल किशोर की पत्नी भी विधायक बनने के लिए ताल ठोक रही हैं। यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह को पोते और बहू दोनों को टिकट दिया गया है। कल्याण सिंह के बेटे पहले से सांसद हैं।

सिर्फ उत्तर प्रदेश ही क्यों उत्तराखंड में भी कमोबेश ऐसी ही स्थति है। बीजेपी के टिकट पर पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की बेटी चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए यशपाल आर्य और उनके बेटे दोनों चुनावी मैदान में हैं। एक और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन बेटे के टिकट के लिए पार्टी को राजी कर लिया।

पंजाब में तो अकाली दल भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह है। परिवार का हर सदस्य राजनीति के परिवारवाद में योग्दान दे रहा है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल खुद चुनाव लड़ रहे हैं। बेटे सुखबीर सिंह बादल भी मैदान में हैं। बहू हरसिमरत कौर मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री हैं। और हरसिमरत का भाई भी विधानसभा चुनाव लड़ रह है।

मुलायम सिंह यादव का तो पूरा परिवार ही राजनीति को समर्पित है। सिर्फ छोटे बेटे को छोड़कर। हालांकि छोटी बहू ने इसकी भी भरपाई कर दी है। लालू यादव के परिवार का भी यही हाल है। दो-दो बेटे बिहार सरकार में मंत्री हैं। बेटी राज्यसभा सदस्य। हरियाण में तमाम ‘लाल’ के लाल राजनीति में परिवारवाद को ही बढ़ाते रहे। भूपिंदर हुड्डा भी इसमें पीछे नहीं रहे।

राजस्थान से लेकर एमपी तक सिंधिया परिवार का राजनीति में परिवारवाद में बेहद महत्वपूर्ण योग्दान है। सिंधिया ही क्यों दिग्विजय सिंह का परिवार भी पीछे कहां है। दक्षिण में चले जाइए तो फिर करुणानिधि का बड़ा परिवार हो या फिर YSR रेड्डी का। या फिर रेड्डी बंधु के नाम से विख्यात जनार्दन रेड्डी का ही परिवार क्यों न हो।

जम्मू-कश्मीर में अब्दुला और मुफ्ती दोनों फैमिली परिवारवाद का सशक्त हास्ताक्षर है। हर पार्टी में पिता का सियासी उत्तराधिकारी भी बेटा ही है। किस-किस का। कहां-कहां से नाम लीजिएगा। हर जगह आपको परिवारवाद की झलक दिख जाएगी। सच तो है कि जितनी भी क्षेत्रिय पार्टियां है, वहां राजतंत्र है। सब एक परिवार के भरोसे चलता है। वे पार्टियां किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से ज्यादा नहीं है। और हर कोई अपनों को अपनी ही पार्टी में आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है।

हालांकि इस सब के बीच याद कीजिए उस दौर को जब विधानसभा चुनाव में बेटे को टिकट की पेशकश पर बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह ने पार्टी से दो टूक कह दिया था कि “तब मैं खुद चुनाव नहीं लड़ूंगा”। पार्टी के बड़े नेता सकते में आ गए और उनके बेटे का टिकट रोक दिया गया। डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह के निधन के बाद उनके बेट विधानसभा की चौखट तक पहुंच पाए।

बिहार के ही एक और मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर ने भी अपने बेटे रामनाथ ठाकुर को टिकट दिए जाने की बात पर कमोबेश ऐसा ही कहा था।

इतिहास में ऐसे कई नेता हुए भी लेकिन ये महज उदराण बनकर क्यों रह गए। इन्होंने जो मोटी लकीरें खींची थी, उसे क्यों मिटा दिया गया। इतिहास के पन्नों को पलटने पर इसके गुनहगार भी मिल जाएंगे। हर कोई अपनी सुविधा के मुताबिक एक नाम ढूंढ लेगा। जिसे वो सियासत में परिवारवाद का प्रेरणास्त्रोत बताकर खुद को सही ठहराने की कोशिश भी करेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब तक इतिहास के उन काले धब्बे को उदाहरण के तौर पर पेश करते रहेंगे। सच तो ये है कि संसदीय लोकतंत्र को मजबूती तभी मिलेगी, जब ज़मीन से जुड़ा कार्यकर्ता सत्ता के शीर्ष पर पहुंचेगा। परिवारवाद लोकतंत्र की बुनियाद को अंदर ही अंदर खोखला और ज्यादा खोखला करता चला जाएगा। इसे सियासी पार्टियों के साथ-साथ वोट देने वाले जनता को भी सोचना पड़ेगा।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

समाजवादी पार्टी

एक बार फिर से वक्त का पहिया घूम रहा है। समझिए तकरीबन 25 बरस पहले... जब समाजवादी शिरोमणि मुलायम सिंह यादव ने रोटी , दाल ,कच्चा प्याज़ और नींबू खाकर सियासत की नई पारी शुरू की थी। लोकतंत्र के पाठ्यक्रम की सियासी किताब में एक नया अध्याय जोड़ा था समाजवादी पार्टी के नाम से। आज फिर से उस साइकिल छाप पार्टी को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटा जा रहा है।

वो साल 1992 का था। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री पद से बेदखल हो चुके थे। यूपी में बीजेपी की नई-नी सरकार बनी थी। 25 बरस में सियासत का हर दांव-पेच सीख चुके मुलायम ने एक ऐतिहास फैसला लिया। लोहिया और जेपी के आदर्श की नींव पर समाजवाद, समानता और प्रजातंत्र की दीवार को जोड़कर एक पार्टी बनाई। 4 अक्टूबर 1992 को बेगम हजरत महल पार्क में मुलायम सिंह यादव ने नई पार्टी का ऐलान कर दिया।  नाम पड़ा समाजवादी पार्टी।

समाजवादी जनता दल से अलग होकर मुलायम सिंह ने पार्टी बना ली थी। लेकिन उनके पास बड़ा जनाधर नहीं था। लोहियावादी जनेश्वर मिश्र और मोहन सिंह सरीखे साथियों के साथ मिलकर मुलायम ने जनाधार बढ़ाना शुरू किया। साइकिल की सवारी कर गांव-गांव दौड़ा किया। लोगों से मिले। लोगों के बीच जाकर पार्टी के सिद्धांत को समझाया। लोगों को मुलायम की बातें समझ में आने लगी थी। मुलायम के साथ-साथ शिवपाल और दूसरे सदस्य भी थे।

समाजवादी पार्टी का जनाधार धीरे-धीरे बढ़ रहा था। लेकिन वक्त की नजाकत कुछ और कह रही थी। मुलायम  की नज़र सत्ता के शीर्ष पर थी। गरीब, पीड़ित, पिछड़ों के हक़ की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए मुलायम ने एक बड़ा फैसला किया। 1993 में विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव ने बीएसपी के साथ गठबंधन कर लिया। दूरदर्शी मुलायम सिंह का ये प्रयोग सफल रहा। इसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी दोबारा सत्ता में नहीं लौट पाई। मुलायम सिंह के हाथ में फिर से यूपी की कमान आ गई। मुलायम को कांग्रेस और जनता दल का भी समर्थन मिला।

 सबकुछ ठीकठाक चल रहा था। इसी बीच साल 1995 में गेस्ट हाउस कांड हुआ। मायावती के साथ अभ्रद्रता के बाद बीएसपी ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। समाजवादी पार्टी की सरकार गिर गई। इस दौरान मुलायम सिंह यादव के साथ अमर सिंह और जया प्रदा जैसी हस्तियां जुड़ती गई।  फिर बच्चन फैमिली जुड़ी। 5 स्टार होटल में पार्टी के कार्यक्रम होने लगे। इसको लेकर कई सवाल भी उठे।

अब मुलायम की नज़र केंद्र पर थी। सूबे की सियासत से बढ़कर वो दिल्ली में राज करना चाहते थे। 1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ। मुलायम सिंह मैनपुरी से सांसद बन गए। संयुक्त गठबंधन की सरकार में मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनने के प्रमुख दावेदार थे। लेकिन लालू यादव ने ऐसा अड़ंगा लगाया कि मुलायम का सपना अधूरा रह गया। लेकिन देवगौड़ा सरकार में रक्षा मंत्री बने। और गुजराल सरकार में भी इसी पद पर रहे। समाजवादी पार्टी के इतिहास में ये एक बड़ा मौका था।

1998 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटने के बाद मुलायम फिर से लखनऊ लौट आए। संगठन को फिर से मजबूत करने में जुट गए। साल 2002 में चुनाव हुआ। समाजवादी पार्टी सत्ता से दूर रह गई। लेकिन मुलायम ने बीएसपी को तोड़ दिया। अमर सिंह ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। साल 2003 में साइकिल पर चढ़कर मुलायम सिंह यादव फिर से 5 कालिदास मार्ग पहुंच गए। यूपी में फिर से समाजवादी सरकार बनी। इस दौरान मुलायम के परिवार के सदस्य भी राजनीति में जुड़ते चले गए।मुलायम के छांव में समाजवादी पार्टी में उनका परिवार बढ़ता चला गया। साल 2004 में लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यूपी में 35 सीटें हासिल की। लेकिन दिल्ली की सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली।

इस बीच साल 2000 में मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव की सियासत में एंट्री हो चुकी थी। पहली बार कन्नौज से अखिलेश यादव पार्टी के सांसद चुने गए। अखिलेश यादव दिल्ली की सियासत करने लगे। लेकिन इस बीच साल 2007 में समाजवादी पार्टी बुरी तरह से हार गई। इसके बाद के पांच साल समाजवादी पार्टी के लिए बेहद उथल-पुथल भरे रहे।  एक ओर राष्ट्रीय राजनीति की ललक, दूसरी ओर क्षेत्रीय क्षत्रप बने रहने की लालसा। इस दुविधा में पार्टी का बंटाधार होने लगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को महज 22 सीटें मिलीं।  इसी दौर में पार्टी के बड़े मुसलमान चेहरा आजम खान ने पार्टी छोड़ दी। राजबब्बर और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेताओं ने भी समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ दिया। बाबरी  कांड के आरोपियों में से एक कल्याण सिंह को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया तो मुलायम के उन  साथियों ने भी पार्टी छोड़ दी जिन्होंने नेताजी के सियासी सफर में कदम से कदम मिलाकर चले थे।

इस बीच घर में घमासान मचा तो साल 2010 में मुलायम के सबसे करीबी अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इस बीच 2011 का साल आया। विधानसभा चुनाव की तैयार होने लगी। मुलायम ने बड़ा फैसला करते हुए बेटे अखिलेश को पार्टी का चेहरा बना दिया। साइकिल की सवारी कर  लोहिया की विचारधारा को युवाओं तक पहुंचाने लगे। दागी नेताओं को पार्टी से बेदखल कर दिया गया। आजम खान फिर पार्टी में जुड़े। लोगों को अखिलेश की बात समझ में आने लगी। अखिलेश यादव को यूपी में ऐतिहासिक जीत मिली। सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री की ताजपोशी हुई। लोहिया के समाजवाद को अखिलेश ने कंप्यूटर से जोड़ दिया।

अखिलेश मुख्यमंत्री बन चुके थे। लेकिन समाजवादी पार्टी में अंत:कलह की बातें भी धीरे-धीरे सामने आने लगी थी। चर्चा होने लगी कि पार्टी में कई गुट बन चुके हैं। कहा जाने लगा कि मुलामय, रामगोपाल, शिवपाल और आजम खान अपने-अपने हिसाब से अपना हित साध रहे हैं। वर्चस्व के लिए शीत युद्ध चल रहा था। इस बीच अमर सिंह की पार्टी में वापसी भी हो गई।

पार्टी में चार साल तक चली ये कसमसाहट 2016 के जून में उभकर सामने आई गई। शिवपाल यादव और अखिलेश यादव आमने-सामने आए गए। जिस पार्टी को मुलायम ने अपने खून-पसीने से सींचा था, जिस पार्टी ने मुलामय को नेताजी बनाया, जिस पार्टी को नेताजी ने अपने बूते खड़ा किया था, वो टूट के कगार पड़ खड़ी थी। एक तरफ मुलामय और शिवपाल थे तो दूसरी तरफ रामगोपाल और अखिलेश थे। रामगोपाल को पार्टी से निकाल भी दिया गया। लेकिन सियासत के सात घोड़ों का साथ-साथ साधने में माहिर मुलायम ने पार्टी के अंदर मचे तूफान को थाम लिया।

मुलायम की ये सियासी सूझबूझ ने भले ही बवंडर को थाम लिया था लेकिन पार्टी अंदर ही अंदर सुलगती जा रही थी। दिसंबर की हाड़ कंपाने वाली ठंड में फिर से पार्टी के अंदर  कसमसाहट शुरू हुई। विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट पर पार्टी में दरार पड़ गई। मुलायम और अखिलेश के बीच लकीर मोटी होती चली गई। डायलॉग के बाद एक्शन का दौर शुरू हुआ। अखिलेश यादव और रामोगपाल यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन जल्द ही मुलामय पिघल गए। बेटे और भाई को पार्टी में वापस बुला लिया। लेकिन अखिलेश के मन में तो कुछ और ही चल रहा था।

पार्टी में चल रहे विवाद का क्लाइमेक्स होने बाकी था। महसचिव रामगोपाल यादव ने पार्टी का अधिवेशन बुलाया। अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर पार्टी की कमान पूरी तरह से अखिलेश यादव को सौंप दी। समाजवादी पार्टी में मुलायम युग का अंत हो गया। इस तरह से समाजवादी पार्टी का नया मुखिया अखिलेश यादव बन गए। इस तरह से 24वां साल पार करने के 3 महीना बीतते-बीतते नए साल के पहले दिन से समाजवादी पार्टी में नए युग की शुरुआत हो गई।

रविवार, 20 नवंबर 2016

रेल मुसाफिरों का दर्द सुनिए 'प्रभु'

रेल मंत्री सुरेश प्रभु जी।  
कहां से शुरू करूं। समझ में नहीं आता। बातें बहुत सारी है। दिक्कतों का खजाना है...शिकायतों का पुलिंदा है। ज़ख्मों को कुरेदना नहीं चाहता। लेकिन बयां करना जरूरी है। एक बार फिर अथाह दर्द है। पटना से लेकर इंदौर तक शोक है। आंखों में आंसू है। आपने फिर रूला दिया रेलमंत्री जी। इससे पहले कि आप की ही तरह सब बेदर्द हो जाये। एक बार आप मेरी बातों पर जरूर गौर कीजिएगा।

रेलमंत्री जी, मौत की आहट देती रेलवे स्टेशन पर जाने का अब मन नहीं करता। मौत के ट्रैक पर दौड़ती रेल पर चढ़ने का अब दिल नहीं चाहता। भारतीय रेल पर कृपा  बरसाने का दावा करके आपने इसे अपने जिम्मे लिया था। लेकिन आपकी रेल और दावे, दोनों फेल हो गये। पिछले  ढाई बरसों में जो कुछ भी हुआ उससे आपका रिपोर्ट कार्ड खून से सना हुआ लगने लगा है

इससे पहले कि आपके रेलवे की खून से भींगी हुई पटरियों के बारे में बताऊं। इससे पहले कि रेलवे की कड़वी हक़ीक़त सुनाऊं। इससे पहले की दुनिया के सबसे बड़े रेलवे का काला सच बताऊं, आपको पुखरायां हादसे के बारे में बताना जरूरी है।  

सुबह का वक्त था। तकरीबन सवा तीन बज रहे थे। इंदौर-पटना एक्सप्रेस रफ्तार से दौड़ रही थी। कुछ लोग इंदौर में चढ़े थे। कुछ लोग उज्जैन में चले थे। कोई अकेला था। कोई परिवार के साथ। ट्रेन की बोगी में कोई सो रहा था। कोई ऊंघ रहा था। कोई जाग रहा था। हर कोई अपनी मंजिल का इंतजार कर रहा था। ट्रेन कानपुर से करीब 100 किमी दूर पुखरायां स्टेशन पहुंची थी। तभी अचानक हादसे की आहट हुई। मौत ने दस्तक की। जोर की एक आवाज गूंजी। भीषण हादसा हो गया। 
चश्मदीद बताते हैं कि अचानक झटका लगा।  कोच S4 चंद सेकंड के लिए धड़धड़ाता रहा। अचानक ब्रेक लगी। कुछ लोगों ने ट्रेन की खिड़कियों और बर्थ को पकड़ लिया। बड़े हादसे ने ट्रेन को अपनी चपेट में ले लिया था। कई डिब्बे पटरी से 25 मीटर दूर खेत में आ चुके थे। कई डिब्बे मलबे में बदल गए थे। कुछ पैसेंजर जिंदा जमीन में दफन हो गए थे...चारों-तरफ चीख पुकार मच गई। 5 मिनट के अंदर सबकुछ बदल गया। आसपास के गांव के लोग दौड़े। उन्होंने मलबे से लोगों को निकालाना शुरू किया।

सुन रहे हैं न रेल मंत्री जी। कलेजा थामकर सुनिएगा। बहुत बड़ा हादसा हुआ है। ऐसा हादसा जिसकी टीस इस देश को हमेशा सालती रहेगी। किसी का बेटा नहीं रहा। किसी की बेटी नहीं रही। किसी के मां-बाप नहीं रहे। किसी की पत्नी नहीं रही। किसी का सुहाग उजड़ गया। किसी- किसी का तो पूरा परिवार ही खत्म हो गया। हंसती खेलती जिंदगी पल भर में तबाह हो गई..।  

कितने लोग इस बार रेल हादसे का शिकार हुए..गिनती 100 के आंकड़े को पार कर गई है..। 100 से ज्यादा लोग जख्मी है। इन आकंड़ों पर मत जाइएगा रेल मंत्री जी। जिंदगी कोई आकंड़ों का हिस्सा नहीं है। आप बस दर्द को समझिए। लोगों को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। कई सारे लोग हैं जो जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। जिन्हें होश है, वे क्या कह रहे हैं वो सुन लीजिए एक बार।

सुबह होते ही रेलवे के बड़े-बड़े अधिकारी पहुंचे। पुलिस के अफसर पहुंचे। केंद्र सरकार के मंत्री पहुंचे। बीजेपी के सांसद पहुंचे। इस सब के बीच 2 डब्बों के बीच फंसे लोगों को एनडीआरएफ के लोग बाहर निकालते रहे।
हादस में मरनेवालों के लिए मुआवजे का एलान हो गया। घायलों के जख्मों पर मुआवजे का मरहम लागया दिया गया। रेलवे की तरफ से भी। केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से भी।

सुना है कि हर बार की तरह इस बार भी जांच के आदेश दिए गए हैं। एक कमेटी बनाई गई है। कमेटी जांच करेगी। जांच के बाद रिपोर्ट देगी। फिर क्या कार्रवाई होगी ये पता नहीं?

इससे पहले भी कई बड़े रेल हादसे हुए। कई सारी कमेटियां बनी। उसने रिपोर्ट दी। लेकिन क्या हुआ इसका पता नहीं चला। खैर, आपकी सरकार फिर एक बार कह रही है कि जो भी दोषी होगा उस पर कार्रवाई होगी

सुरेश प्रभु जी, आपसे काफी उम्मीदे हैं। आप तो सोशल मीडिया पर मुसाफिरों की सहायता करने के लिए जाने जाते हैं। आप तो रेलवे का आधुनिकीकरण करने के लिए जाने जाने जाते हैं। आप ट्रेन में चलते हुए यात्रियों पर कृपा बरसाते हैं तो फिर ये हादसे क्यों नहीं रूक रहे हैं रेलमंत्री जी।  रेल यात्रियों के लिए आप क्यों नहीं कुछ कर पाते हैं। आप की लाइफलाइन अब डेड लाइन बन चुकी है। कैसे करूं आपकी रेल में यात्रा। अब हिम्मत नहीं करता रेल पर चढ़ने की।
यकीन जानिये रेलमंत्री जी , ट्रेन पर चलते समय हर पल मौत के साये में कटता है। अब डर लगता है ट्रेन पर चढ़ने में। ट्रेन की सिटी अब डराने लगी है। बच्चों में जिस रेल छुक छुक आवाज सुनन के लिए कान तसरसते था आज उसी से डर लगने लगा है। लोहे की पटरियों को देखकर सांसें तेज हो जाती है। एक अनहोनी की आशंका हमेशा मन में बनी रही है। हम डरा नहीं रहे हैं, हकीकात बता रहे हैं रेलमंत्री जी।  

आपको भी याद होगा कि प्रधानमंत्री मोद खुद कई बार रेलवे का जिक्र कर चुके हैं। कई बार बता चुके हैं कि उनका बचपन ट्रेन में गुजरा है। वो रेल को भलीभांति समझते हैं। तो फिर 

----मोदी सरकार के एजेंडे में शामिल होने के बावजूद ऐसे हादसों पर लगाम क्यों नहीं लगी?
----हमारी सरकार बुलेट ट्रेन चलानी की बात करती है। टैल्गो ट्रेन चलाने की बात करती है। लेकिन पैसेंजर्स की सुरक्षा कैसे और कब होगी। आपकी सरकार बने ढाई साल बीत गए। रेल हादसे बढ़ते जा रहे हैं। रेल हादसों में कमी लाने के लिए सरकार ने कोई प्लान क्यों नहीं बनाया?
-----रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए काकोदकर कमेटी बनाई गई थी रेलमंत्री जी। कमेटी में कुछ बातें कही थी। लेकिन अब तक इस कमेटी की सिफारिशें लागू क्यों नहीं की गई?
----बात-बात पर नैतिकता की बात करनेवालों नेताओं के, सरकार की नैतिकता ऐसे हादसों पर कहां चली जाती है?
----पहले तो नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री और फिर बड़े अफसर इस्तीफा तक दे देते थे, लेकिन अब ऐसा क्यों नहीं होता?  

मैं जानता हूं कि राजनीति में जज्बात कोई मायने नहीं रखते। लेकिन इंसान हूं। सुना था कि आप दयावान हैं। उम्मीद थी कि आप अपने यात्रियों पर कृपा बरसायेंगे। लेकिन क्या हुआ? जख्मों पर मरहम लगाने के लिए मुआवजे का ऐलान कर दिया। विरोधियों को जवाब देने के लिए जांच कमेटी बना दी। लेकिन क्या इतने भर से आपकी जिम्मेवारी खत्म हो जाती है। आंसुओं के समंदर में डूबे उन सैकडों परिवारों को आप क्या जवाब देंगे। क्या गलती थी उन बच्चों की जो असमय हादसे के शिकार हो गये। क्या जवाब देंगे उनके मां-बाप को जिन्होंने अपनी बच्ची को ठीक से प्यार भी नहीं किया था, और वो उससे हमेशा के लिए दूर हो गयी। क्या जवाब है आपके पास उन बच्चों के लिए जो अनाथ हो गये। कैसे उन मां के आंसु को रोक पायेंगी, जिनके बुढ़ापे का सहारा आपने छिन लिया। 

ये कोई पहली घटना नहीं है, जिसे भूल जाऊं। हम ये सवाल ऐसे नहीं उठा रहे हैं सर। आकंड़े बहुत ही भयावह है। जब से आपकी सरकार बनी है, तब से देख लीजिए। कितनी मौतें हुई है। 

---- 4 महीने पहले 25 जुलाई 2016 को भदोही में ट्रेन की चपेट में स्कूल वैन आ गई थी,  7 मासूम मौत की हो गई थी। 
----5 अगस्त 2015 को मध्य प्रदेश में हरदा के पास कामयानी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई...29 यात्रियों की मौत हुई
---13 फरवरी 2015 को बैंगलुरू-एर्नाकुलम एक्सप्रेस हादसे का शिकार हुई...हादसे में 10 लोगों की मौत
-----25 मई 2015 को  कौशांबी के सिराथू रेलवे स्टेशन के पास हादसा, 25 लोगों की मौत हो गई
------21 मार्च 2015 को  रायबरेली के बछरावां रेलवे स्टेशन पर हादसा, 32 लोगों की मौत हो गई
-----26 मई 2014 को गोरखधाम एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, 40 लोगों की मौत हो गई थी 
-----30 सितम्बर 2014 को गोरखपुर में 2 ट्रेनों में टक्कर, 14 की मौत, 50 जख्मी

ये तो कुछ आंकड़े हैं। कुछ हादसों की कथा है। हादसों की फेहरिस्त काफी लंबी है। हादसे रोकने के लिए बड़ा प्लान बनाई सर। बड़ी उम्मीद के साथ सदानंद गौड़ा से लेकर आपके जिम्मे रेलवे को दिया गया था। बुलेट और टेल्गो ट्रेन चालने से पहले हादसा रोकने के लिए जरूर कुछ कीजिए। 
आपका रेलवे इतना लापरवाह क्यों हो गया है। प्रभु इतने बेबस क्यों हो गए हैं? बहुत हो गया सर । आखिर कब तक चलेगा ये सिलसिला। कब जागेगी आपकी ममता। कब तक लोग ट्रेन से यमलोक जाते रहेंगे। अब बस कीजिए रेलमंत्री। प्लीज

शनिवार, 19 नवंबर 2016

नोटबंदी से 'उम्मीदों' की मौत

मैं न तो बीजेपी समर्थक हूं। न कांग्रेस के साथ हूं। न ही दूसरी किसी पार्टी से  जायज या नजायज ताल्लुकात है मेरा। मैं कोई अर्थशास्त्री भी नहीं हूं। आम आदमी हूं। नफा-नुकसान का सीधा मतलब समझता हूं। लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म समझ में नहीं आता। यूं कहिए कि समझना नहीं चाहता। क्योंकि आज कटेगा, ये महीना पूरा होगा तो आगे की सोचेंगे। हम तो 20 तारीख के बाद सैलरी का इंतजार करनेवालों में से हैं।

नौकरी पेशा हूं। अप्रैजल का इंतजार करता रहता हूं। कान और आंख खोलकर रखने की कोशिश करता हूं । ताकि इससे ज्यादा सैलरी पर कहीं नौकरी मिल जाए। ताकि कोई नई कंपनी खुले तो उसमें नौकरी मिले।

नोटबंदी से किसे फायदा हुआ नहीं पता। कब फायदा होगा ये भी नहीं पता। कितने कालेधन वाले धन जाने से खुदकुशी कर लेंगे ये भी नहीं पता। कितने लोगों का पैसा कागज का टुकड़ा बन जाएगा ये भी नहीं पता। न ही ये पता है कि देश की अर्थव्यवस्था से कितनी मजबूती मिलेगी।

मैं बस इतना जानता हूं कि हमारे जैसे लोगों के लिए कई संभावनाओं की अचानक मौत हुई है। हमारी उम्मीदों की सरकार ने भ्रूणहत्या कर दी है। जहां-जहां नई नौकरियां दी जा रही थी, उसे तत्काल प्रभाव से रोक दिया गया है। इंटरव्यू होने के बावजूद नौकरी बीच में अटक गई। कई नई कंपनियां पाइप लाइन में थी, जिसका कुछ ही दिनों में औपचारिक एलान होने वाला था, वे प्रोजेक्ट रूक गए। कमोबेश हर  कंपनियों में चर्चा सकारात्मक नहीं है। अप्रैजल पर कटौती की तलवार लटक रही है। दबी जुबान से छंटनी जैसे संकट की चर्चा होने लगी है।

सबसे बड़ा डर तो ये सता रहा है कि नोटबंदी के आड़ में कंपनी वाले कहीं छंटनी न करे। छंटनी से बच गए तो सैलरी में कटौती न कर दें। उससे बच गए तो बढ़ती महंगाई के बीच सैलरी जस के तस रह जाएगी। सबसे बच गए तो खून चूसकर काम करवाया जाएगा। चार के बदले एक आदमी से काम करवाया जाएगा। 

2009 से खराब स्थिति दिख रही है। कैसे मान लूं कि नोटबंदी से फायदे हैं। अगर होंगे भी तो क्या तब तक लोग भूखे रहेंगे? अगर कंपनी चलेगी नहीं। अगर काम होगा नहीं तो मजदूरी कहां से मिलेगी? मजदूरी मिलेगी नहीं तो फिर खाएंगे क्या? बच्चों को खिलाएंगे क्या? उन्हें पढ़ाएंगे कैसे? वक्त गुजर जाने के बाद कुछ नहीं होता। अगर बच्चों की पढ़ाई का वक्त बीत जाएगा तो बाद में फ्री में एडमीशन होने का भी क्या फायदा होगा?  

आपको अगर नोटबंदी पसंद आ रही है तो आपको मुबारक। आप अगर किसी दूसरे के पैसे बर्बाद होने से खुशी मिल रही है तो आपको मुबारक। आप अगर इस गलतफहमी हैं कि दो नंबर का पैसा इकट्ठा करनेवाले कंगाल हो जाएंगे, देश में समाजवाद आ जाएगा तो ये गलतफहमी आपको मुबारक। लेकिन अच्छे दिन के धागों से बनी अफवाहों की चादर से बाहर झांकिएगा  तो आप भी कमोबेश मेरी तरह महसूस कीजिएगा। अगर आप ऐसा महसूस नहीं कर पा रहे हैं तो आप में जरूर कुछ विशेष है।

रविवार, 6 नवंबर 2016

सियासत में सेहत 'धुआं-धुआं'

दिल्ली में पिछले 2-3 दिनों से चारों तरफ धुआं-धुआं है। दोपहर में अंधेरा सा है। कोहरा नहीं है। हवा में घुल चुके जहर का असर है। प्रदूषण की चादर से आसमान लिपटी हुई है। दिल्ली की सांसें फूल रही है। यकीन मानिए...दिल्ली की एक बड़ी आबादी ने ऐसी भयानक तस्वीर कभी नहीं देखी होगी। वाकई दिल्ली गैस चैंबर बन चुकी है। दिल्ली में प्रदूषण ने पिछले 17 बरस का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। प्रदूषण मापने वाली मशीन भी छोटी पड़ी गई। तय मानकों से 17 गुना ज्यादा खतरानक एयर क्वालिटी हो चुकी है दिल्ली की। 
         
जिस दिल्ली में पीएम से लेकर तमाम मंत्री, अफसरान, सीएम तक रहते हैं। उस दिल्ली का दम फूल रहा है। देश की सबसे बड़ी बड़ी अदालत है। देश की दिशा तय करनेवाल दिल्ली बीमार हो रही है। बेचैन हैं दिल्ली वाले। कौन बचाएगा? प्रदूषण रिकॉर्ड तोड़ रहा है। कौन रोकेगा? गैस चैंबर बन चुकी है दिल्ली। कौन बाहर निकालेगा? हवा में बदबू है। लोग सांस कैसे लेंगे?  
           
दिल्ली में तीन निज़ाम हैं केंद्र, राज्य और एमसीडी। लेकिन तीनों लाचार दिख रहे हैं। दिल्ली को बचाने के लिए कोई बड़ा उपाय ढूंढने की बजाय सियासत में उलझे हुए हैं। एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। बैठक पर बैठक कर रहे हैं। दिल्ली सरकार कहती है कि प्रदूषण के लिए हरियाणा और पंजाब की सरकार जिम्मेदार है। क्योंकि दोनों राज्यों में फसलों को जलाया जा रहा है। अब जब स्थिति हद से गुजर गई है तो पंजाब के सीएम किसानों को फसल नहीं जलाने की अपील की है। लेकिन प्रदूषण की सियासत में दिल्ली वाले पिस रहे हैं। 
           
जहर घुली हवा जब सिर पर मंडराने लगी। जब लोगों की सांसें फूलने लगी। तब जाकर केजरीवाल को आम आदमी की फिक्र आई। मंत्रियों को इकट्ठा किया। कई बड़े फैसले लिए। स्कूल बंद। फैक्ट्रियां बंद। जेनरेटर्स बंद। कंस्ट्रक्शन बंद। डिमोलिशन बंद। डीजल गाड़ी बंद। बहुत कुछ बंद। अब कलेकिन केजरीवाल के फैसले कितने कारगर होंगे, इसे देखना है। लेकिन जिस तरह से फैसला लेते-लेते केजरीवाल ने देरी की, उससे सवाल तो उठेंगे ही। क्योंकि पिछले बरस ही कोर्ट ने सरकार को चेता दिया था। 
             
सवाल केंद्र सरकार पर भी उठेंगे। क्योंकि इसी दिल्ली में प्रधानमंत्री भी रहते हैं। मोदी के तमाम मंत्री भी रहते हैं। उन्होंने क्या किया। क्या सियासत की आड़ लेकर दिल्ली को छोड़ देना जायज है? अगर केजरीवाल सरकार निंद में सोती रही, अगर खुदकुशी करनेवाले पूर्व फौजी के शोक में डूबी रही, एलजी से तकरार में उलझी रही तो इसका मतलब ये नहीं कि केंद्र सरकार भी दिल्लीवालों को भगवान भरोसे छोड़े दे? क्या मोदी को, मोदी के मंत्रियों को  दिल्ली की आवोहवा नहीं दिख रही है?
           
असल में शहाद और खुदकुशी पर सियासत करनेवालों को स्मॉग में भी कुछ फायदा दिखने लगा। अगर ऐसा नहीं है तो फिर जब लोग बीमारी की दहलीज पर खड़े हैं तो मिलकर क्यों कोई ठोसा उपाय किया जा रहा है? लोगों को साफ हवा भी क्यों मुहैया नहीं करा पाती है सरकार? जब पिछले साल ही स्थिति बेकाबू हो गई थी तो फिर इस साल भी पहले से क्यों नहीं तैयारी की गई? 

सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

'समाजवादी संत' के नाम एक चिट्ठी

नेताजी, 
मेरी राजनीतिक समझ के हिसाब से आपकी ज़िंदगी में 23 अक्टूबर की तारीख बहुत ही दर्दनाक होगी। तकलीफ देनेवाली होगी। झकझोरनेवाली होगी। तिनका-तिनका जोड़कर जिस पार्टी को आपने बनाया। जिस परिवार को आपने दशकों तक जोड़ कर रखा। उसके दो फाड़ साफ-साफ दिख रहे थे। आपकी भावुकता इसे प्रमाणित करता है। लेकिन महाबैठकों के बाद ऐसे लग रहा है कि परिवार में मचे तूफान को  आपने तत्काल थाम लिया है। हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ये सुलह कब तक रहेगी? क्योंकि ये पार्टी के ऊपर परिवार और ईगो की लड़ाई है। खैर, ये सब आप बेहतर जनते होंगे। लेकिन मेरा सवाल इसे कहीं दूसरा है।  24 अक्टूबर को जब आप महाबैठक में बोल रहे थे, तो आपने कई सारी बातें कही। आपने मुख्यमंत्री को बेटे के अंदाज में फटकारा तो भाई का साथ दिया। उन्हें पुचकारा। आपने बहुत सारी अच्छी बातें कही। जो किसी अनुभवी नेता को कहनी चाहिए। जो एक पिता को कहनी चाहिए। लेकिन आपकी बातों से मेरे दिमाग में कुछ सवाल कौंध रहे हैं, क्योंकि आप लोहिया की समाजवादी विचारधारा की बात करते हैं। क्योंकि आपको कुछ लोग आपको समाजवादी  संत कहते हैं। समाजवादी शिरोमणि कहते हैं।

नेताजी, आपने कहा कि मुख्तार अंसारी का परिवार ईमानदार है। जो फैसला हुआ वो पार्टी के हित में हुआ। सर, आपको किस हिसाब से मुख्तार अंसारी का परिवार ईमानदार लगता है। क्या आपको पता नहीं है कि मुख्तार अंसारी को पूर्वांचल का रॉबिनहुड यूं ही नहीं कहा जाता है। क्या आपको पता नहीं है कि मुख्तार पर धमकी देने, हत्या, वसूली, दंगा भड़काने के कितने केस दर्ज हैं। क्या आपको पता नहीं कि वो आपराधिक गिरोह चलता है। पूरा परिवार उसके साथ है। क्या आपको याद नहीं कि पहले भी वो आपके साथ था। फिर चला गया। फिर सटा। वो मौका परस्त है। क्या सच में मुख्तार का परिवार आपको ईमानदार लगता है। अगर हां  तो वाकई आप समाजादी संत हैं।

नेताजी, आपने संकेत में ही सही लेकिन अखिलेश यादव को कहा कि वो शराबियों और जुआरियों की मदद कर रहे हैं। सर, वो तो ठीक है। हो सकता है कि कर रहे होंगे। लेकिन जिन-जिन लोगों की तारीफ में आप कसीदे पढ़ रहे थे। क्या वो कैसे हैं आपको नहीं पता है। वो किन-किन लोगों की मदद कर रहे हैं ये आप नहीं जानते। अगर नहीं जानते हैं तो वाकई आप समाजवादी संत हैं। 

नेताजी, आपने कहा कि युवा हमारे साथ हैं। तो सर, ये आप जान लीजिए कि आज की तारीख में समजावादी पार्टी का वही युवा आपके साथ हैं, जिसका कोई निजी हित होगा। अगर आप  अब भी ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि समाजवादी युवाओं का असली नेता अखिलेश यादव हैं तो वाकई आप समजावादी संत हैं। 

नेताजी, आपने कहा कि शिवपाल आमलोगों के नेता हैं। कई लोगों ने चापलूसी को धंधा बना लिया। सर, इसमें कोई शक नहीं कि शिवपाल आमलोगों के नेता हैं। लेकिन क्या शिवपाल चापलूस नहीं हैं। क्या वो आपकी चापलूसी नहीं करते हैं। लोगों के बीच शिवपाल यादव की छवि कैसी है ये आपको पता नहीं है। कैसे-कैसे कब्जाधारियों से शिवपाल के संपर्क हैं ये आपको नहीं मालूम हैं। अगर नहीं है तो आप वाकाई समाजवादी संत हैं।

नेताजी, आपने अमर सिंह को अपना भाई बताया। उनके  कई अहसानों का जिक्र किया आपने। कुछ का नहीं किया। कर भी नहीं सकते। ये सबको पता है। खैर। आप भूल गए कि आपका ये भाई कुछ महीने पहले तक आपको क्या-क्या कहता था। आप भूल गए कि पार्टी से जब आपने अमर सिंह को बाहर कर दिया था, तो उन्होंने आपके लिए कैसे-कैसे विशेषणों का इस्तेमाल किया था। कैसे-कैसे मुहावरे और शेरो-शायरी पढ़ता था आपके लिए। अगर आप वाकई भूल गए हैं तो आप सही में समजावादी संत हैं।

नेताजी, आपने कहा कि लाल टोपी पहनकर कोई समजवादी नहीं बन जाता। आपने बिल्कुल ठीक बातें कही। लेकिन लाल टोपी पहनाकर आपने ही लोगों को समजावादी बनाना सिखाया है। अमर सिंह और जयाप्रदा को क्या पता कि समाजवाद का संघर्ष क्या है। अखिलेश, धर्मेंद्र, रामगोपाल, डिंपल, तेजप्रताप को तो आपने ही लाल टोपी पहनाकर समाजवादी बनाया। आपने तो कल्याण सिंह और उनके बेटे को भी टोपी पहनाकर समाजवादी बना दिया था। क्या आपको याद नहीं है। अगर याद नहीं है तो ठीक ही लोग आपको समजावादी संत कहते हैं।

नेताजी, आपने अपने भाषण के दौरान एक बार समाजवाद की परिभाषा पूछी थी। जाहिर वो अखिलेश और अखिलेश समर्थकों के तरफ उछाला गया सवाल था। लेकिन एक बात बताइए सर कि आपकी पार्टी के कितने लोग समजावाद का असली मतलब समझते हैं। अगर एक-आध समझते भी हैं तो क्या वो उसपर अमल करते हैं। अगर आप इसका जवाब नहीं देंगे तो वाकई आप समजावादी संत हैं।

नेताजी, आपने एक बार जिक्र किया कि समाजवादी पार्टी टूट नहीं सकती। तो सर ये बात एक मंझे हुए नेता के तौर पर बिल्कुल ठीक है। पार्टी सुप्रीमो होने के नाते कहा तो भी ठीक। लेकिन हकीकत आफ जानते हैं। आपको पता है कि आपकी पर्टी, आपके परिवार में खेमेबाजी किस हद तक है। अब तो पार्टी अंदर से बिखर चुकी है। आपकी लाज रखकर दोनों गुट कब तक एक रहते हैं ये देखना है। फिर भी आपको लगता है कि पार्टी नहीं टूटेगी तो आप वाकई समाजवादी संत हैं। 

आखिरी में नेताजी, पार्टी में चल रहे झगड़ों से आपका दुखी होना लाजिमी है। लेकिन आप वक्त को समझिए। अब अखिलेश युग आ चुका है। साइकिल पर चढ़नेवाले भी अब लैपटॉप की बात करते हैं। जाति और धर्म की सियासत ठीक है। लेकिन इससे कहीं ऊपर अब विकास की सियासत पहुंच चुकी है। इसमें आपसे और शिवपाल यादव से अखिलेश कहीं आगे हैं। अगर आप नहीं समझ रहे हैं तो वाकई आप समाजवादी संत हैं।

धन्यवाद

रविवार, 9 अक्तूबर 2016

'दलाली' के बाद ममा-बाबा की बात

बाबा के एक बयान के बाद टीवी पर गहमागहमी शुरू हो चुकी थी। ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी थी। एंकर सब गला फाड़कर चिल्लाने लगा था। तभी मैडम के फोन की घंटी बजी। पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता ने फोन किया था। 
मैडम, बाबा ने क्या कहा दिया है सुना आपने?  
हां, सुना है।
मैडम, वो मीडिया वाले मेरे घर के बाहर खड़े हैं। रिएक्शन मांग रहे हैं।
छोड़ो अभी। कोई रिएक्शन मत दो। फोन कर रहा है तो कह दो कि मुझे इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं है।
जी मैडम। 
फोन रखते ही। दूसरे नेता का फोन। मैडम ने उसे भी यही बातें कही। फिर तीसरा। फिर चौथा। फिर पांचवा। फिर एक-एक कर न जाने पार्टी के कितने पदाधिकारियों के फोन आ गए। सिर्फ यही पूछने के लिए मैडम, बाबा के बयान पर क्या रिएक्शन दूं।
अंत में मैडम झल्ला गईं। दो-चार नेताओं को झाड़ लगाई। मोबाइल को साइलेंट मोड में रख दिया। फोन से रिसिवर हटा दिया। बेटी को भी अपने घर बुला लिया। सलाहकार मियां को भी बुला लिया था। बिन बुलाए आफत के बारे में दोनों मां-बेटी सोच ही रही थी कि सभा खत्म करने के बाद बाबा घर आए। अपने घर जाने की बजाय सीधे ममा से मिलने पहुंचे।
मैडम ने पूछा- आ गए। हां ममा, जवाब मिला।
पता है तुझे, आज फिर तुमने बोलते-बोलते क्या बोल दिया।
येस ममा। लेकिन ममा, मैं तो कड़े शब्दों में फेकू पर अटैक रहा था। मीडिया अटेंशन के लिए। 
लेकिन दलाली शब्द बोलने की क्या जरूरत थी?
मैंने तो ऐसे ही बोल दिया था ममा।
क्या ऐसे ही बोल दिया। 12 साल में तुमने कुछ नहीं सीखा। सही में तुम पप्पू हो। लोग कुछ गलत नहीं कहते।  
ममा के मुंह से पप्पू सुनते ही बाबा गुस्सा गए। तुनकते हुए कहा- आपने भी तो एक बार उसे मौत का सौदागर कहा था। मैंने तो सिर्फ दलाल ही कहा है। इतना ही नहीं। आपने तो ये भी एक बार कहा था कि फेकू जहर की खेती करता है।
ये क्या फेकू-फेकू  बोल रहे हो। 'डिग्गी' ने एक बार सिखा दिया। वही रट्टा मार लिया। अपने मन से भी कुछ बोलो। और हां, वो जब मैंने मौत का सौदागर बोला था, तब क्या हुआ था, तुम्हें याद है। गुजरात में कितनी कम सीटें मिली थी कांग्रेस को। उससे भी कुछ नहीं सीख पाए पप्पू। सच तो ये है कि तुम्हें कुछ याद ही नहीं रहता। नशे से बाहर निकलो तब तो।
ऐसे मत बोलिए। रट्टा मार के न बोलूं तो क्या बोलूं। पूरे यूपी में घूम-घूमकर वही बोला जो रट्टा मारा था। एक बार अपने मन से बोल दिया तो आप लोग कह रहे हैं कि गोबर कर दिया। 
ममा निराश होकर बोली। जा पप्पू। तेरा कुछ नहीं होगा। कब तू बड़ा होगा पता नहीं। इसीलिए तुम्हारी शादी भी हम नहीं करवा रहे हैं।
जो होगा। सो होगा। लेकिन आप मुझे पप्पू मत कहा कहिए हां।
रूठ कर बाबा मां के कमरे से बाहर निकले। अपने घर पर पहुंचे। उस कमरे में खुद को बंद कर लिया, जहां गांजा, अफीम जैसे कुछ चीजें रखी हुई थी। उधर दूसरी तरफ मैडम अब डैमेज कंट्रोल में जुट गई।