शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

जनता फटेहाल...नेता मालामाल

एक झोपड़ी से निकलकर राजनीति के आसमान में झिलमिल सितारों की तरह चमकने वाले लालू यादव हों...या एक गांव के स्कूल में पढ़ाते-पढ़ाते समाजवादी सियासत के शिरोमणि बने मुलायम सिंह या फिर दिल्ली की एक गली से निकलकर लखनऊ के महल में विराजने वाली मायावती हो ...चौटाला...जयललिता...डीके शिवकुमार...या फिर जगनमोहन रेड्डी हों। सियासत में इनकी सफलता की असीमित ऊंचाई तक पहुंचने का सफर जितना दिलचस्प है। उससे कहीं ज्यादा मजेदार है इनकी अकूत संपत्ति के मालिक होने की कहानी। ऐसे एक-दो नहीं पूरे 289 नेताओं की लिस्ट है कोर्ट के पास, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के चंद बरस सियासी कुर्सी पर निवेश किया और प्रॉफिट पूरे 500 परसेंट की हो गई। जनता फटेहाल रह गयी लेकिन देह पर खादी ओढ़ते ही ये नेता मालामाल हो गए। सियासत करते-करते इन्होंने इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया कि सुप्रीम कोर्ट तक को पूछना पड़ा कि नेता बनते ही ये लोग कैसे साक्षात लक्ष्मी का पदार्पण हो जाता है इनके घर में ? कैसे कुबेर इनके ऊपर कृपा बरसाने लगते हैं ? कोर्ट  ने कहा कि आय का स्रोत जानने के लिए जांच जरूरी है और यह भी पता लगाना जरूरी है कि प्रॉपर्टी का जो आकलन किया गया है वह कानूनी तौर पर कितना सही है।
बिहार की राजनीति में खुद को रॉबिनहुड कहने वाले लालू यादव को ही देख लीजिए। पूरा परिवार जांच एजेंसियों के चक्रव्यूह में यूं ही नहीं फंसा है। एक बेटे नाम पर पेट्रोल पंप है, दूसरे के नाम मॉल। बेटी के नाम कई कंपनियां तो राबड़ी के नाम हजारों एकड़ ज़मीन। ED से लेकर आईटी और सीबीआई तक रीसर्च में जुटी है, आखिर कमोबेश यही स्थिति यूपी के सबसे बड़े सियासी खानदान की है। समाजवाद का मंत्र जपने वाले मुलायम सिंह की संपत्ति भी सालों से खंगाल रही है सीबीआई। आपके शायद न पता हो लेकिन शुरुआती दिनों में साइकिल की सवारी करने वाले मुलायम के परिवार में कारों की प्रदर्शनी लगी है। भांति-भांति की गाड़ियां हैं। अभी कुछ ही दिन पहले कर्नाटक में कांग्रेस के ट्रॉबुल शूटर डीके शिवकुमार के ठिकानों आयकर के अफसर पहुंचते थे। सियासत को मुनाफे की फैक्ट्री बनाने के चक्कर में लालू यादव, जयललिता, चौटाला, जगनमोहन सरीखे नेता जेल की शोभा बढ़ा चुके हैं। हिमाचल की सत्ता पर काबिज वीरभद्र सिंह की अकूत संपत्ति बनाने की वीरगाथा उस वक्त चर्चा की विषय बन गयी थी, जब उन्होंने बताया था कि सेब उपजाकर उन्होंने अरबों रूपये कमा लिये। जबकि रिपोर्ट बताती है कि खेतों और बागों में काम करने वाले मजदूर और अमीरों के बीच फासला बढ़ता जा रहा है। इसलिए बड़े विद्वान अर्थशास्त्रियों के बीच भी ये शोध का विषय बना हुआ है कि आखिर कैसे नेताओं की संपत्ति 5 सालों में 500 फीसदी बढ़ जाती है ?

शनिवार, 22 जुलाई 2017

इजरायल की अनकही बातें

इलजारयल...एक ऐसा देश जो चारों तरफ से दुश्मन देशों से घिरा हुआ है...इसके बाजवूद किसी की हिम्मत नहीं होती है कि उसकी तरफ आंख उठाकर देख सके....ऐसा यूं ही मुमकिन नहीं हुआ है....इसके पीछे है इजरायल के लोगों की स्वाभिमानी और देशभक्त सोच.। 
अब हम आपको बताते हैं कि क्या है इजरायल की वो खासियतें, जो उसको सबसे अलग और आत्मविश्वास से लबरेज करती है। असल दुनिया के मानचित्र पर इजरायल का जन्म 1948 में हुआ। देश की मान्यता मिलते ही अरब देशों ने इजरायल पर अटैक कर दिया....लेकिन इजरायल से जीत नहीं पाए...इसके बाद इजरायल पर 6 बार हमला हुआ,,. लेकिन हर बार इजरायल आगे ही बढ़ता गया। इजरायल के सभी स्टूडेंट्स, चाहे वह लड़का हो या लड़की, सभी को हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अनिवार्य रूप से मिलिट्री सर्विस जॉइन करनी पड़ती है...इजरायल की सेना में आधे से ज्यादा लड़कियां है।
इजरायल का एक ही मंत्र है कि किसी भी आतंकी घटना के बाद एक के बदले दुश्मन के 50 लोगों को मारो...फिलिस्तीनी आतंकवादियो ने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक गेम्स विलेज में घुसकर 11 इजरायली खिलाडियों की हत्या कर दी थी... तब प्रधानमंत्री ने सारे मृत खिलाड़ियो के घरवालों को खुद फोन करके कहा की हम बदला लेकर रहेंगे...और उसके बाद  इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने अलग-अलग देशों से ढूंढकर सभी आतंकियों को मार गिराया।
दुनिया में सिर्फ इजराय ही यहुदियों का देश है...दुनिया में किसी भी देश में पैदा होने वाले को इजराय की नागरिकता मिल जाती है...यहां की भाषा हिब्रु है...मध्यकाल में हिब्रु का भाषा का आतं हो गया । लेकिन इजरायल के जन्म के बाद इसे राष्ट्रभाषा बनाया गया।
इजरायल में साढ़े तीन हजार से भी ज्यादा टेक्नॉलोजी कंपनी हैं...मोटोरोला कंपनी ने पहला फोन इजरायल में ही बनाया था...माइक्रोसॉफ्ट के लिए पेंटीएम चिप, यूएसपी पेंड्राइव, एंटी वायरस, पहली वॉयस मेल तकनीक यहीं विकसित की गई थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि हर पाकिस्तानी पासपोर्ट पर लिखा होता है कि यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशो में मान्य है।
.इजरायली बैंक द्वारा जारी नोट को दृष्टिहीन भी पहचान सकते हैं, क्योंकि उसमें ब्रेल लिपि का भी इस्तेमाल किया जाता है...इजरायल की वायुसेना दुनिया में चौथे नंबर की वायुसेना है।  इजरायल दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जो समूचा एंटी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम से लैस है। इजरायल की ओर जाने वाली हर मिसाइल रास्ते में ही दम तोड़ देती है।
इजरायल दुनिया में उन 9 देशों में शामिल है, जिसके पास अपना सेटेलाइट सिस्टम है। इजरायल अपनी जरुरत का 93 प्रतिशत खाद्य पदार्थ खुद पैदा करता है...इजरायल के कृषि उत्पादों में 25 साल में सात गुणा बढ़ोतरी हुई है, जबकि पानी का इस्तेमाल जितना किया जाता था, उतना ही अब भी किया जा रहा है.।
इजरायल में 137 ऑफिशियल बीच हैं। जबकि इजरायल के पास महज 273 किमी समुद्री तट है। इजरायल देश जब आजाद हुआ तो पार्लियामेंट के पहले रिजॉल्यूशन में भारत की प्रशंसा की थी कि भारत ही ऐसा देश है, जहां यहुदी रहते हैं और उन्हें कभी अपमानित नहीं किया जाता...लेकिन संयोग देखिए की 70 सालों में कोई भारतीय प्रधानमंत्री इजरायल तक नहीं पहुंचा...जबकि भारत के दुश्मनों से हर लड़ाई में इजरायल ने भारत का सपोर्ट किया था।

सियाचिन के वीरों को मोदी का तोहफा

एक विशाल हिमपर्वत...ज़मीन ऐसी बंजर और दर्रे इतने ऊंचे कि जहां तक, पक्के दोस्त या फिर कट्टर दुश्मन ही पहुंच सकते हैं...चारों तरफ सफेद बर्फ की मोटी चादर...हाड़ गला देने वाली ठंड...जहां 15 सेकेंड में ही शरीर कोई खाली हिस्सा सुन्न पड़ सकता है...कहीं हज़ारों फ़ुट ऊंचे पहाड़ तो कहीं हजारों फूट गहरी खाइयां... न पेड़-पौधे, न जानवर, न पक्षी....उस जगह का नाम है सियाचिन...जो दुनिया का सबसे ऊंचा बॉर्डर है... जहां तैनात रहती है हिमयोद्धाओं की टोली सरहद की सुरक्षा के लिए। 

सियाचिन में सैनिकों के लिए दुश्मनों की गोली से ज्यादा खतरनाक बर्फ के टुकड़े होते हैं...पिछले 30 सालों में तकरीबन 900 जवान मौसम की वजह से शहीद हो गए...यहां ठंड के मौसम में माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पुहंच जाता है...इतने बर्फ रहते हैं कि अगर सूरज की रोशनी बर्फ से पड़ने के बाद किसी का आंख में चली जाए तो वो शख्स अंधा हो सकता है...इस जगह पर साल में 365 दिन हाथ में बंदूक थामे खड़े रहते हैं सेना के जवान।

सियाचिन में करीब 10 हजार सैनिक तैनात हैं। सैनिक कपड़ों की कई तह पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे स्नो कोट कहते हैं..सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लिपिंग बैग में सोते हैं। कभी-कभी ऑक्सिजन की कमी से सोते-सोते ही सैनिक की मौत हो जाती है.,,,सैनिक न नहाते हैं और न ही दाढ़ी बनाते हैं।

एक पर्वतारोही की तरह काम करने वाले ये सैनिक पाकिस्तान और चीन पर हर पल निगाहें जमाए रहते हैं...हर वक्त मुश्किलों से लड़ने वाले सैनिकों का दर्द मोदी भी समझते हैं...यही वजह है कि मोदी जब देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे तो अपनी पहली दिवाली 12 हजार फीट ऊंचे बर्फ के टीले पर सैनिकों के साथ मनाया...सियाचिन में सैनिकों के साथ खड़े होने वाले पहले प्रधानमंत्री थे मोदी। 

सियाचिन में सैनिकों पर हर दिन 5 करोड़ से ज्यादा का खर्च आता है...लेकिन ज़िंदगी को दांव पर लगाकर सरहद की सुरक्षा में लगे इन हिमयोद्धाओं को महज 14 हजार रूपये अलाउंस मिलता था। लेकिन  अब मोदी सरकार ने जवानों का भत्ता 14 हजार से बढ़ाकर 30 हजार रूपये कर दिया है। जबकि अफसरों का भत्ता 21 हजार से बढ़ाकर 42 हजार 500 रूपये कर दिया है। सैनिकों को ये फायदा 1 जुलाई से मिलना शुरू हो चुका है। सियाचीन में तैनात जवानों और अफसरों को ये भत्ता मुश्किल परिस्थितियों में काम करने के एवज में दिया जाता है। रक्षा विशेषज्ञ सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं...कह रहे हैं कि जिस हालात में जिंदगी को दांव पर  लगाकर सेना सियाचिन में सीमा की सुरक्षा में लगती रहती है, उनके लिए तो ये जरूरी ही है। 

सियाचिन की चोटी पर तैनात जवानों को ठीक से खाना भी नसीब नहीं होता है...विपरित परस्थितियों में दुश्मनों से टकराने के लिए तैयार रहने वाले भारत के बहादुर सपूतों के लिए मोदी सरकार ने तोहफा दिया है। 

मानसरोवर की अनकही बातें

कैलाश मानसरोवर....नाम सुनते ही आपके जेहन में जो तस्वीरें घूमती हैं...वो बेहद आनंद देती है...आस्था और विश्वास से ओतप्रोत हो जाता है मन,...आप किसी भी धर्म के हों...हिंदू हों, बौद्ध या फिर जैन या सिख....आप आस्था के अट्टालिका पर पहुंच जाते हैं सोचते-सोचते...हर साल एक बड़ा जत्था जाता है कैलाश मानसरोवर के लिए...हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोग मानसरोवर पहुंचते हैं...मुश्किलों की बेड़ियों को तोड़ते हुए । 
जिस कैलाश मानसरोवर को आप हिंदुओं की आस्था का महाकेंद्र मानते हैं, वो असल में दूसरे धर्मों के लोगों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। हिंदुओं के लिए ये महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है...कहते हैं कि यहां स्वयंव भगवान शिव निवास करते हैं। बौद्ध धर्म को मानने वाले कहते हैं कि यहीं पर रानी माया को भगवान बुद्ध की पहचान हुई थी जैन धर्म की माने तो आदिनाथ ऋषभदेव का यह निर्वाण स्थल 'अष्टपद' है। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहां कुछ दिन रुककर ध्यान किया था।   
कैलाश मानसरोवर को कुबेर की नगरी भी कहा जाता है...यह चार नदियों से घिरा हुआ है...कैलाश के चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख है जिसमें से नदियों का उद्गम होता है  ... पश्चिम में सतलुज नदी है...पूरब में ब्रह्मपुत्र नदी है...दक्षिण में करनाली तो उत्तर में सिंधु नदी बहती है। 
कैलाश मानसरोवर तिब्बत में स्थित है, जहां चीन का कब्जा है। कैलाश मानसरोवर जाने का एक रास्ता उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होकर जाता है। दूसरा रास्ता सिक्किम के नाथुला दर्रे से होकर गुजरता है।उत्तराखंड के रास्ते राजने में 24 दिन और सिक्किम होकर जाने में 21 दिन लगते हैं। चीन का बॉर्डर पार करने के बाद ही कैलाश मानसरोवर पहुंचा जा सकता है।
बर्फीले रास्तों से होकर कैलाश मानसरोवर का सफर तय करना पड़ता है...मानसरोवर एक झील है...कहते हैं कि इसे ब्रह्मा ने बनाया था।  इस झील पर जाने का सबसे बेहत समय सुबह 3 बजे से 5 के बीच होता है, जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। झील लगभग 320 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। 
ड्रोल्मा से नीचे बर्फ़ से हमेशा ढकी रहने वाली ल्हादू घाटी में स्थित एक किलोमीटर परिधि वाला पन्ने के रंग की झील है, जिसे गौरीकुंड कहते हैं...यह कुंड हमेशा बर्फ़ से ढंका रहता है, लेकिन तीर्थयात्री बर्फ़ हटाकर इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करते हैं। 
कैलाश पर्वत कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। घोडे और याक पर चढ़कर ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके कठिन रास्ते से होते हुये यात्री डेरापुफ पहुंचते हैं। जहां ठीक सामने कैलाश के दर्शन होते हैं। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूरब को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।  
कैलाश मनसरोवर यात्रा विदेश मंत्रालय के जरिए होती है। हर साल ये यात्रा जून से सितंबर महीने के बीच में होती है।  70 साल का कोई शख्स को तंदरुस्त हो इस यात्रा में शामिल हो सकता है...केंद्र सरकार की तरफ से कोई वत्तीय सहायत नहीं मिलती...हालांकि अलग-अलग राज्य सरकारों ने अपने सूबे के यात्रियों के लिए सब्सिडी का ऐलान जरूर किया है। 

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

राजनीति का परिवारवाद

राजनीति में परिवारवाद का वटबृक्ष वक्त के साथ विशाल होता जा रहा है। कम्यूनिस्ट पार्टियों को छोड़कर कमोबेश हर दल में एक जैसी स्थिति है। सियासी दलों में हर डाल से एक बृक्ष बनता चला जा रहा है। ताज्जुब की बात ये है कि हर कोई राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ बोलता है, लेकिन इसे रोकने की बजाय हर नेता इसे विस्तार करने की दिशा में मौन सहमति दे देता चला जाता है। हर नेता दूसरे दल के परिवारवाद के खिलाफ जमकर बोलता है, लेकिन खुद आइने की तरफ देखने से कतराता है।

सच ये है कि लोकतंत्र में परिवारवाद कैंसर सरीखे है। लेकिन इसका इलाज करने की बजाय हर दल इसे स्वीकार करते हुए बढ़ रहा है। एक बार फिर परिवारवाद की चर्चा हो रही है। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में जिस तरीके से टिकटों का बंटवारा हुआ, उससे सवाल उठने शुरू हो गए हैं। खासकर जब परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पर तीखा तंज कसने वाली बीजेपी की लिस्ट में परिवारवाद को खाद-पानी दिया गया। बड़े नेताओं के बेटे-बहू, बेटी-दामाद और रिश्तेदारों को टिकटों से नवाजा गया।

संयोग देखिए कि जिस उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों को लेकर बीजेपी पर परिवारवाद का सबसे बड़ा आरोप लग रहा है उसी यूपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से अपने नेताओं से अपील की थी कि अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट न मांगें। लेकिन 10 दिन बाद जब टिकट तय करने के लिए बैठकों का दौर चला तो बड़े नेताओं के रिश्तेदारों के लिए पैरवी पत्र पेश कर दिए गए। उस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी भी थे। अपनी पार्टी के नेताओं को नसीहत देने वाले मोदी ने उस बैठक में क्या कहा, ये मुझे नहीं पता, लेकिन जब लिस्ट बाहर निकली तो उसमें से परिवारवाद टपक रहा था।

अब सवाल उठता है कि मोदी की नसीहत भी टिकट बंटवारे के वक्त क्यों बेअसर हो गई? आखिर क्यों ज़मीन पर झंडा ढोने वाले मुंह ताकते रह गए और बडे नेताओं के साहबजादे/ साहबजादियां के घर टिकट पहुंच गया? एक से दो बार खुद निर्वाचित हो जाने के बाद नेता क्यों अपने परिवारवालों के लिए राजनीति में आगे बढ़ने की सीढ़ी बनते चले जाते हैं? क्यों अपने बेटे-बहू, बेटी-दामाद और रिश्तेदारों की जगह पक्का करने की जुगाड़ में सबकुछ दांव पर लगा देते हैं?

दरअसल इसमें कहीं से भी दो राय नहीं है कि मौजूदा दौर में राजनीति को नफा-नुकसान की कसौटी पर कसा जाने लगा है। जाहिर है कि जब हिसाब-किताब लाभ और हानि को लेकर होगी। जब राजनीति करने वाले नेता खुद को फायदे और नुकसान के तराजू में तौलेंगे तो सेवा भाव का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। ऐसे में राजनीति में समाजसेवा की भावना को सूली पर टांग दिया गया है।

यानी बदलते दौर में संसदीय राजनीति का मिज़ाज ही मुनाफा कमाने वाली कंपनी सरीखे हो चुकी है। जिसका मकसद शेयर होल्डर्स को फायदा पहुंचाने से ज्यादा है नहीं। ऐसे में कंपनी चलाने वाले नेता, या फिर कहिए कि संचालक मंडल में शामिल बड़े-बड़े नेताओं के परिवार के सदस्य ही अगर शेयर होल्डर्स हो जाएं तो फिर हर्ज क्या है? सच यही है कि हर्ज सिर्फ उन्हीं कार्यकर्ताओं को होती है, जो टिकट के इंतजार में झंडा ढोते-ढोते अपनी जवानी को दांव पर लगा दते हैं और अंत में कुछ नहीं मिलता। बाकी तो उन्हीं ऊपर से टपकाए गए नेता नेता के पीछे-पीछे चल देते हैं। जिन बड़े नेताओं को परिवारवाद पसंद नहीं भी है, वे जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक, तमाम तरह के समीकरण में उलझकर रह जाते हैं।

इस दौर की राजनीति को देखकर किसे यक़ीन होगा कि देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने तो अपने बेटे को इतनी हिदायत देते हुए कहा था कि “मेरे नाम का कभी दुरुपयोग मत करना। जब तक मैं दिल्ली में हूं, तब तक यहां से जितनी दूर रह सकते हो रहना।” लेकिन संयोग देखिए की मौजूद गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे को सिटिंग विधायक का टिकट काटकर विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया गया है। राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को कहां से टिकट दिया जाए, इस बात को लेकर कई दिनों तक मंथन हुआ, आलम ये कि सबसे अंतिम में सीट फाइनल हुआ और नामांकन के आखिरी दिन पंकज सिंह ने पर्चा दाखिल किया।  

सिर्फ राजनाथ सिंह ही क्यों, बीजेपी के बड़े-बड़े दिग्गजों ने अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलवाई है। लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन को टिकट मिला। सांसद हुकूम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट दिया गया। सासंद सर्वेश सिंह के बेटे सुशांत सिंह को विधानसभा का उम्मीदवार बनाया गया। सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण को टिकट मिला। जबकि मोहनलालगंज से सांसद कौशल किशोर की पत्नी भी विधायक बनने के लिए ताल ठोक रही हैं। यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह को पोते और बहू दोनों को टिकट दिया गया है। कल्याण सिंह के बेटे पहले से सांसद हैं।

सिर्फ उत्तर प्रदेश ही क्यों उत्तराखंड में भी कमोबेश ऐसी ही स्थति है। बीजेपी के टिकट पर पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की बेटी चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए यशपाल आर्य और उनके बेटे दोनों चुनावी मैदान में हैं। एक और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन बेटे के टिकट के लिए पार्टी को राजी कर लिया।

पंजाब में तो अकाली दल भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह है। परिवार का हर सदस्य राजनीति के परिवारवाद में योग्दान दे रहा है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल खुद चुनाव लड़ रहे हैं। बेटे सुखबीर सिंह बादल भी मैदान में हैं। बहू हरसिमरत कौर मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री हैं। और हरसिमरत का भाई भी विधानसभा चुनाव लड़ रह है।

मुलायम सिंह यादव का तो पूरा परिवार ही राजनीति को समर्पित है। सिर्फ छोटे बेटे को छोड़कर। हालांकि छोटी बहू ने इसकी भी भरपाई कर दी है। लालू यादव के परिवार का भी यही हाल है। दो-दो बेटे बिहार सरकार में मंत्री हैं। बेटी राज्यसभा सदस्य। हरियाण में तमाम ‘लाल’ के लाल राजनीति में परिवारवाद को ही बढ़ाते रहे। भूपिंदर हुड्डा भी इसमें पीछे नहीं रहे।

राजस्थान से लेकर एमपी तक सिंधिया परिवार का राजनीति में परिवारवाद में बेहद महत्वपूर्ण योग्दान है। सिंधिया ही क्यों दिग्विजय सिंह का परिवार भी पीछे कहां है। दक्षिण में चले जाइए तो फिर करुणानिधि का बड़ा परिवार हो या फिर YSR रेड्डी का। या फिर रेड्डी बंधु के नाम से विख्यात जनार्दन रेड्डी का ही परिवार क्यों न हो।

जम्मू-कश्मीर में अब्दुला और मुफ्ती दोनों फैमिली परिवारवाद का सशक्त हास्ताक्षर है। हर पार्टी में पिता का सियासी उत्तराधिकारी भी बेटा ही है। किस-किस का। कहां-कहां से नाम लीजिएगा। हर जगह आपको परिवारवाद की झलक दिख जाएगी। सच तो है कि जितनी भी क्षेत्रिय पार्टियां है, वहां राजतंत्र है। सब एक परिवार के भरोसे चलता है। वे पार्टियां किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से ज्यादा नहीं है। और हर कोई अपनों को अपनी ही पार्टी में आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है।

हालांकि इस सब के बीच याद कीजिए उस दौर को जब विधानसभा चुनाव में बेटे को टिकट की पेशकश पर बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह ने पार्टी से दो टूक कह दिया था कि “तब मैं खुद चुनाव नहीं लड़ूंगा”। पार्टी के बड़े नेता सकते में आ गए और उनके बेटे का टिकट रोक दिया गया। डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह के निधन के बाद उनके बेट विधानसभा की चौखट तक पहुंच पाए।

बिहार के ही एक और मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर ने भी अपने बेटे रामनाथ ठाकुर को टिकट दिए जाने की बात पर कमोबेश ऐसा ही कहा था।

इतिहास में ऐसे कई नेता हुए भी लेकिन ये महज उदराण बनकर क्यों रह गए। इन्होंने जो मोटी लकीरें खींची थी, उसे क्यों मिटा दिया गया। इतिहास के पन्नों को पलटने पर इसके गुनहगार भी मिल जाएंगे। हर कोई अपनी सुविधा के मुताबिक एक नाम ढूंढ लेगा। जिसे वो सियासत में परिवारवाद का प्रेरणास्त्रोत बताकर खुद को सही ठहराने की कोशिश भी करेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब तक इतिहास के उन काले धब्बे को उदाहरण के तौर पर पेश करते रहेंगे। सच तो ये है कि संसदीय लोकतंत्र को मजबूती तभी मिलेगी, जब ज़मीन से जुड़ा कार्यकर्ता सत्ता के शीर्ष पर पहुंचेगा। परिवारवाद लोकतंत्र की बुनियाद को अंदर ही अंदर खोखला और ज्यादा खोखला करता चला जाएगा। इसे सियासी पार्टियों के साथ-साथ वोट देने वाले जनता को भी सोचना पड़ेगा।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

समाजवादी पार्टी

एक बार फिर से वक्त का पहिया घूम रहा है। समझिए तकरीबन 25 बरस पहले... जब समाजवादी शिरोमणि मुलायम सिंह यादव ने रोटी , दाल ,कच्चा प्याज़ और नींबू खाकर सियासत की नई पारी शुरू की थी। लोकतंत्र के पाठ्यक्रम की सियासी किताब में एक नया अध्याय जोड़ा था समाजवादी पार्टी के नाम से। आज फिर से उस साइकिल छाप पार्टी को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटा जा रहा है।

वो साल 1992 का था। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री पद से बेदखल हो चुके थे। यूपी में बीजेपी की नई-नी सरकार बनी थी। 25 बरस में सियासत का हर दांव-पेच सीख चुके मुलायम ने एक ऐतिहास फैसला लिया। लोहिया और जेपी के आदर्श की नींव पर समाजवाद, समानता और प्रजातंत्र की दीवार को जोड़कर एक पार्टी बनाई। 4 अक्टूबर 1992 को बेगम हजरत महल पार्क में मुलायम सिंह यादव ने नई पार्टी का ऐलान कर दिया।  नाम पड़ा समाजवादी पार्टी।

समाजवादी जनता दल से अलग होकर मुलायम सिंह ने पार्टी बना ली थी। लेकिन उनके पास बड़ा जनाधर नहीं था। लोहियावादी जनेश्वर मिश्र और मोहन सिंह सरीखे साथियों के साथ मिलकर मुलायम ने जनाधार बढ़ाना शुरू किया। साइकिल की सवारी कर गांव-गांव दौड़ा किया। लोगों से मिले। लोगों के बीच जाकर पार्टी के सिद्धांत को समझाया। लोगों को मुलायम की बातें समझ में आने लगी थी। मुलायम के साथ-साथ शिवपाल और दूसरे सदस्य भी थे।

समाजवादी पार्टी का जनाधार धीरे-धीरे बढ़ रहा था। लेकिन वक्त की नजाकत कुछ और कह रही थी। मुलायम  की नज़र सत्ता के शीर्ष पर थी। गरीब, पीड़ित, पिछड़ों के हक़ की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए मुलायम ने एक बड़ा फैसला किया। 1993 में विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव ने बीएसपी के साथ गठबंधन कर लिया। दूरदर्शी मुलायम सिंह का ये प्रयोग सफल रहा। इसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी दोबारा सत्ता में नहीं लौट पाई। मुलायम सिंह के हाथ में फिर से यूपी की कमान आ गई। मुलायम को कांग्रेस और जनता दल का भी समर्थन मिला।

 सबकुछ ठीकठाक चल रहा था। इसी बीच साल 1995 में गेस्ट हाउस कांड हुआ। मायावती के साथ अभ्रद्रता के बाद बीएसपी ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। समाजवादी पार्टी की सरकार गिर गई। इस दौरान मुलायम सिंह यादव के साथ अमर सिंह और जया प्रदा जैसी हस्तियां जुड़ती गई।  फिर बच्चन फैमिली जुड़ी। 5 स्टार होटल में पार्टी के कार्यक्रम होने लगे। इसको लेकर कई सवाल भी उठे।

अब मुलायम की नज़र केंद्र पर थी। सूबे की सियासत से बढ़कर वो दिल्ली में राज करना चाहते थे। 1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ। मुलायम सिंह मैनपुरी से सांसद बन गए। संयुक्त गठबंधन की सरकार में मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनने के प्रमुख दावेदार थे। लेकिन लालू यादव ने ऐसा अड़ंगा लगाया कि मुलायम का सपना अधूरा रह गया। लेकिन देवगौड़ा सरकार में रक्षा मंत्री बने। और गुजराल सरकार में भी इसी पद पर रहे। समाजवादी पार्टी के इतिहास में ये एक बड़ा मौका था।

1998 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटने के बाद मुलायम फिर से लखनऊ लौट आए। संगठन को फिर से मजबूत करने में जुट गए। साल 2002 में चुनाव हुआ। समाजवादी पार्टी सत्ता से दूर रह गई। लेकिन मुलायम ने बीएसपी को तोड़ दिया। अमर सिंह ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। साल 2003 में साइकिल पर चढ़कर मुलायम सिंह यादव फिर से 5 कालिदास मार्ग पहुंच गए। यूपी में फिर से समाजवादी सरकार बनी। इस दौरान मुलायम के परिवार के सदस्य भी राजनीति में जुड़ते चले गए।मुलायम के छांव में समाजवादी पार्टी में उनका परिवार बढ़ता चला गया। साल 2004 में लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यूपी में 35 सीटें हासिल की। लेकिन दिल्ली की सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली।

इस बीच साल 2000 में मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव की सियासत में एंट्री हो चुकी थी। पहली बार कन्नौज से अखिलेश यादव पार्टी के सांसद चुने गए। अखिलेश यादव दिल्ली की सियासत करने लगे। लेकिन इस बीच साल 2007 में समाजवादी पार्टी बुरी तरह से हार गई। इसके बाद के पांच साल समाजवादी पार्टी के लिए बेहद उथल-पुथल भरे रहे।  एक ओर राष्ट्रीय राजनीति की ललक, दूसरी ओर क्षेत्रीय क्षत्रप बने रहने की लालसा। इस दुविधा में पार्टी का बंटाधार होने लगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को महज 22 सीटें मिलीं।  इसी दौर में पार्टी के बड़े मुसलमान चेहरा आजम खान ने पार्टी छोड़ दी। राजबब्बर और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेताओं ने भी समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ दिया। बाबरी  कांड के आरोपियों में से एक कल्याण सिंह को समाजवादी पार्टी में शामिल किया गया तो मुलायम के उन  साथियों ने भी पार्टी छोड़ दी जिन्होंने नेताजी के सियासी सफर में कदम से कदम मिलाकर चले थे।

इस बीच घर में घमासान मचा तो साल 2010 में मुलायम के सबसे करीबी अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इस बीच 2011 का साल आया। विधानसभा चुनाव की तैयार होने लगी। मुलायम ने बड़ा फैसला करते हुए बेटे अखिलेश को पार्टी का चेहरा बना दिया। साइकिल की सवारी कर  लोहिया की विचारधारा को युवाओं तक पहुंचाने लगे। दागी नेताओं को पार्टी से बेदखल कर दिया गया। आजम खान फिर पार्टी में जुड़े। लोगों को अखिलेश की बात समझ में आने लगी। अखिलेश यादव को यूपी में ऐतिहासिक जीत मिली। सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री की ताजपोशी हुई। लोहिया के समाजवाद को अखिलेश ने कंप्यूटर से जोड़ दिया।

अखिलेश मुख्यमंत्री बन चुके थे। लेकिन समाजवादी पार्टी में अंत:कलह की बातें भी धीरे-धीरे सामने आने लगी थी। चर्चा होने लगी कि पार्टी में कई गुट बन चुके हैं। कहा जाने लगा कि मुलामय, रामगोपाल, शिवपाल और आजम खान अपने-अपने हिसाब से अपना हित साध रहे हैं। वर्चस्व के लिए शीत युद्ध चल रहा था। इस बीच अमर सिंह की पार्टी में वापसी भी हो गई।

पार्टी में चार साल तक चली ये कसमसाहट 2016 के जून में उभकर सामने आई गई। शिवपाल यादव और अखिलेश यादव आमने-सामने आए गए। जिस पार्टी को मुलायम ने अपने खून-पसीने से सींचा था, जिस पार्टी ने मुलामय को नेताजी बनाया, जिस पार्टी को नेताजी ने अपने बूते खड़ा किया था, वो टूट के कगार पड़ खड़ी थी। एक तरफ मुलामय और शिवपाल थे तो दूसरी तरफ रामगोपाल और अखिलेश थे। रामगोपाल को पार्टी से निकाल भी दिया गया। लेकिन सियासत के सात घोड़ों का साथ-साथ साधने में माहिर मुलायम ने पार्टी के अंदर मचे तूफान को थाम लिया।

मुलायम की ये सियासी सूझबूझ ने भले ही बवंडर को थाम लिया था लेकिन पार्टी अंदर ही अंदर सुलगती जा रही थी। दिसंबर की हाड़ कंपाने वाली ठंड में फिर से पार्टी के अंदर  कसमसाहट शुरू हुई। विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट पर पार्टी में दरार पड़ गई। मुलायम और अखिलेश के बीच लकीर मोटी होती चली गई। डायलॉग के बाद एक्शन का दौर शुरू हुआ। अखिलेश यादव और रामोगपाल यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन जल्द ही मुलामय पिघल गए। बेटे और भाई को पार्टी में वापस बुला लिया। लेकिन अखिलेश के मन में तो कुछ और ही चल रहा था।

पार्टी में चल रहे विवाद का क्लाइमेक्स होने बाकी था। महसचिव रामगोपाल यादव ने पार्टी का अधिवेशन बुलाया। अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर पार्टी की कमान पूरी तरह से अखिलेश यादव को सौंप दी। समाजवादी पार्टी में मुलायम युग का अंत हो गया। इस तरह से समाजवादी पार्टी का नया मुखिया अखिलेश यादव बन गए। इस तरह से 24वां साल पार करने के 3 महीना बीतते-बीतते नए साल के पहले दिन से समाजवादी पार्टी में नए युग की शुरुआत हो गई।