गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

तंबाकू उत्पादों पर बैन दिखावा है!

दिल्ली में खैनी, गुटखा, जर्दा सरीखे तंबाकू उत्पादों पर बैन लगा दिया गया। तंबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध का एलान करते हुए दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि पुलिस और स्वास्थ्य विभाग इस पर कड़ी नजर रखेगी। ताकि चोरी- छिपे कोई इसे न तो बेच सके और न ही खरीद सके। कानून तोड़ने वालों को सात साल तक की जेल और
दो लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया। गुटखा, खैनी, जर्दा खरीदने और बेचने वालों की शिकायत के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया गया।

लेकिन सरकार का फैसला रस्मभर होकर रह गया। क्योंकि दिल्ली के हर कोने में तंबाकू उत्पाद मिल रहे हैं। बेचने वालों को थोड़ी झिझक जरूर हो रही है, लेकिन बिक्री जारी है। खरीदने वालों को 5 रुपए के बदले 8 रुपए चुकाने पड़ रहे हैं, लेकिन आसानी से मिल रहा है। न तो कोई पकड़ने वाला है और न ही कोई रोकने वाला।

दिल्ली कोई पहला राज्य नहीं है, जहां तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा हो, और वह सरकारी फरमान बनकर रह गया। दिल्ली से पहले बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में गुटखा, खैनी, जर्दा की खरीद-बिक्री पर रोक है। बावजूद हर राज्य में धड़ल्ले से तंबाकू उत्पाद बेचे जा रहे हैं। खरीदे जा रहे हैं। न कोई शिकायत करने वाला है, न टोकने वाला।

सवाल उठता है कि लोगों की जिंदगी से जुड़ा सरकार का ये फरमान रस्म अदायगी बनकर क्यों रह जाता है। क्या पुलिस और प्रशासन की सहमति के बिना तंबाकू उत्पादों की खरीद-बिक्री हो सकती है। बिल्कुल नहीं। क्योंकि इसे बेचने वाले बहुत ही छोटे-छोटे दुकानदार होते हैं। जाहिर है कि सरकारी ठेकेदारों को हफ्ता देने के बाद ही इन दुकानदारों की हिम्मत बढ़ती है और वो धड़ल्ले से गैरकानूनी काम करते हैं। सरकारी फरमान को सूली पर टांग देते हैं।  

सरकार को तंबाकू-उत्पाद खरीद-बिक्री करनेवालों पर दंड का प्रावधान करने के साथ-साथ उन पुलिस-प्रशासन के लिए भी त्वरित और ज्यादा सजा की व्यवस्था करनी चाहिए जिसके जिम्मे इसकी निगरानी होती है। जो गुटखा-खरीद बिक्री होते देखकर भी अंधे की तरह खड़े रहते हैं। जो वसूली में अपने ईमान का सौदा करते हैं। ताकि सवाल सरकार की मंशा पर न उठे। लोग इसे सियासी फायदे और सहानुभूति बटोरने वाला सरकारी फरमान से आगे समझ सके। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. दिखावा ही है यदि वास्तव में गंभीर हो तो उत्पाद ही बंद क्यों न कर दे ...न रहेंगे बांस न बजेगी बांसुरी ....

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  2. उत्पादन बंद करना तो राज्यसरकार के बस की बात नहीं है, वो केंद्र सरकार के अधीन आता है। लेकिन खरीद-बिक्री पर निगरानी में कठोरता तो दिखा सकता है। जिसका अभाव है। वही अखरता है।

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