मंगलवार, 17 जुलाई 2012

सवाल टिप्पणी भर का नहीं है....

पहले टाइम मैग्जिन और अब ब्रिटिश अख़बार ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर सवाल खड़ा किया है। टाइम मैग्जिन ने अंडर एचिवर कहा तो द इंडिपेंडेट ने उन्हें सोनिया गांधी के हाथों का गुड्डा करार दिया है । सवाल सिर्फ टाइम मैग्जिन और ब्रिटिश अखबार की टिप्पणी भर से नहीं है। सवाल है कि आखिर ऐसा कहा क्यों जा रहा है। जिस मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनते ही विदेशी मीडिया में चिंता की लकीर खींच गई थी,   आज अगर उसी मनमोहन सिंह को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो जाहिर है, कि ये सवाल सिर्फ मनमोहन सिंह की कार्य क्षमता या कांग्रेस को लेकर ही नहीं बल्कि देश के लिए भी है।  
            याद कीजिए, आठ बरस पहले जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे, तो उस दौर में अमेरिका, चीन और ब्रिटेन से लेकर हर विदेशी मीडिया में इस बात को लेकर चर्चा हुई कि भारत का सबसे सफल वित्त मंत्री अब प्रधानमंत्री बन गया है। तो आर्थिक नीति और संपन्नता में भारत कहीं आगे निकल जाएगा। दूसरे देश पीछे छूट जाएंगे। कहीं न कहीं पहली कतार में खड़े देशों के बीच एक डर बन गया था। मनमोहन सिंह से ये उम्मीद की जा रही थी कि बतौर वित्त मंत्री उन्होंने जो करके दिखाया, उसे वो प्रधानमंत्री बनने के बाद आगे बढ़ाएंगे। उनसे उस सपने को पूरा करने की उम्मीद थी, जिसने आर्थिक उदारीकरण के आसरे लोगों में जगाया था। देश की अर्थव्यवस्था और मज़बूत होगी। आर्थिक रूप से संपन्न भारत दुनिया पर भारी पड़ेगा।  
    लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद जब ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। न तो अर्थव्यवस्था को लेकर मनमोहन सिंह ने कोई नीति बनाई और न ही ऐसा कुछ किया, जो सोनिया गांधी के विचार से इतर हो। देश की आर्थिक व्यवस्था चौपट होती गई । और मनमहोन सिंह मौन बने रहे । महंगाई आसमान छूती गई । पाकिस्तान और बंग्लादेश से ज्यादा कीमतों पर भारत में पेट्रोलियम बिकने लगा। डॉलर के मुकाबले रूपया टूटता ही जा रहा है । लेकिन मनमोहन सिंह कोई ठोस फैसला नहीं ले सके। अगर रोजगार गांरटी योजना की बात हो या फिर इंदिरा आवास योजना, सब का श्रेय कांग्रेस और सरकार दोनों, सोनिया गांधी को देती है, न कि मनमोहन सिंह को। तो ऐसे में अब विदेशी मीडिया को टिप्पणी करने का मौका मिल रहा है। और इसमें वो पीछा भी नहीं हट रही। 

1 टिप्पणी:

  1. जी हां तभी शायद किसी ने टिप्पणी की थी कि मनमोहन सिंह का सब्जेक्ट इकोनोमिक्स था और उनसे पेपर पोलटिकल साइंस के लिए जा रहे हैं तो उनका फ़ेल होना तो अवशयंभावी ही था । सामयिक पोस्ट

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