मंगलवार, 10 जुलाई 2012

क्या यूपी में जंगल राज नहीं है ?


उत्तर प्रदेश में अपराधी बेलगाम हो चुके हैं । अखिलेश राज के सौ दिनों के दरम्यान राज्यभर में 1149 लोगों की हत्याएं हो चुकी है । यानी औसतन ग्यारह से बारह लोग हर रोज मारे जा रहे हैं । ये नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ें हैं । जमीनी सच्चाई इससे भी ज्यादा डरावनी है । यूपी में कानून व्यवस्था की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देशभर में जितने भी अपराध होते हैं, उसके 33 फीसदी यानी एक तीहाई अपराध सिर्फ यूपी में होता है । जब से अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने हैं, तब से अपराध का ग्राफ और बढ़ा है । हत्या, लूट और बलात्कार की घटनाओं में बेहताशा बढोत्तरी हुई है । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यूपी में जंगल राज नहीं है ? 
         याद कीजिए उस दौर को जब बिहार में लालू - राबड़ी का राज था । विपक्षी पार्टियां, मीडिया यहां तक कि बड़े बड़े विद्वानों  ने लालू - राबड़ी राज की तुलना, जंगल राज से की थी । उस वक्त पटना, गोपालगंज, सीवान या फिर मुज़फ्फरपुर में दो रूपये के एक अंडे की खातिर पचपन रूपये की गोली मार दी जाती थी । दिन दहाड़े बच्चों को उठा लिया जाता था । लेकिन उत्तर प्रदेश में तो अपराधी इससे भी आगे निकल चुके हैं । यहां तो बहू- बेटियों को सरेराह उठा लिया जाता है । लगभग हर दिन बलात्कार की घटनाएं समाने आ रही है । बलात्कार के बाद लड़कियों को ज़िंदा जला दिया जाता है । लखनऊ, कानपुर, नोएडा और गाजियाबाद से लेकर बहराइच और बाराबंकी तक । हर जगह एक जैसी स्थिति है ।   
         कमोबेश यही स्थिति मायावती राज में थी । अखिलेश ने बेहतर कानून व्यवस्था का वादा किया । बिगड़ी व्यवस्था से आजिज लोगों ने अखिलेश के सच से दिखनेवाले वादों पर भरोसा किया । एक तेज तर्रार पढ़े लिखे युवा के हाथ में सत्ता सौंपी । जिस तरह से प्रशानिक अमलों में फेरबदल हुए, उससे लोगों में बेहतर कानून व्यवस्था की उम्मीद जगी । लेकिन अखिलेश राज में तो मानो अपराधी और बेलगाम होते चले गये । अपराधियों पर सरकार का कोई अंकुश नहीं रहा । आखिर अखिलेश यादव कानून व्यवस्था को दुरूस्त करने में नाकाम क्यों हैं ?  
        दरअसल छात्रों को टैबलेट और लैपटोप देने की योजना बनाने में व्यस्थ अखिलेश सरकार ने अब तक ऐसी कोई नीति नहीं बना पाई है, जिससे अपराधियों को डर लगे । उन्हें कानून का भय हो । जिसमें अपराधियों को गिरफ्तार कर उसे सजा देने का प्रावधान हो ।
          इसकी दूसरी बड़ी वजह सपा के कार्यकर्ता हैं । अखिलेश यादव वो लकीर नहीं खींच पा रहे हैं, जिससे सपा कार्यकर्ता और अपराधी में फर्क हो सके । समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता न तो अखिलेश की बात मानते हैं और ना ही नेताजी यानी मुलायम की । कई बार हिदायत के बावजूद समाजवादी कार्यकर्ताओं की गुंडई थमने का नाम नहीं ले रही है । यहा तक कि कोतवाली के भीतर ही गुंडई शुरू कर देते हैं । उनके सामने पुलिस तक की घिग्घी बंध जाती है । पुलिस का मनोबल गिरता है । और इसी आड़ में दूसरे अपराधियों का डर भी कम होता जा रहा है । 
      यही स्थिति बिहार में लालू यादव के साथ हुई थी । लालू के कार्यकर्ता भी इसी तरह बेलगाम हो चुके थे । जिसका नतीजा लालू और उनके पार्टी को अभी तक भुगतना पड़ रहा है । अगर समय रहते अखिलेश यादव नहीं चेते, तो इनका भी वही हाल होगा, जो लालू का हुआ । 

1 टिप्पणी:

  1. सही कहा आपने....यूपी में बिहार से भी खराब स्थिति है...

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