बुधवार, 11 मार्च 2015

मिस्टर क्लीन के ऊपर कोयला का धब्बा

अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने जो बातें सपने में भी नहीं सोची होगी, वो हकीकत बनकर उनके सामने खड़ी है। उनकी खासियत रही कि दलदल में रहते हुए भी मिस्टर क्लीन की छवि को उन्होंने बनाए रखा। लेकिन काली कोठरी से बेदाग बाहर निकलना बेहद मुश्किल है। नामुमकिन की तरह। कोई कितना भी बचना चाहे, छींटे तो उसके ऊपर पड़ने ही है। और देखिए कि उम्र के अंतिम पड़ाव में आकर मनमोहन सिंह के ऊपर यही छीटें पड़ चुके हैं। जिस शख्स ने देश में आर्थिक योजनाओं को अपने तरीके से परिभाषित किया। अर्थव्यवस्था को बुलंदी की ऊंचाई पर पहुंचाई। उसे नया आयाम दिया। उस शख्स पर देश की आर्थिक स्थित को कमजोर करने से लेकर विश्वासघात तक के आरोप लगे हैं।   

याद कीजिए उस दौर को जब नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। अर्थव्यवस्था रसातल में थी। देश दिवालियापन के कगार पर था। तब नायक बनकर उभरे थे डॉक्टर मनमोहन सिंह। वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने न सिर्फ देश को आर्थिक उदारीकरण की ओर ले गए बल्कि दुनिया के लिए बाजार का रास्ता भी खोल दिया। अर्थव्यवस्था की सेहत सुधरी तो  हिंदुस्तान महाशक्ति बनकर उभरा। मनमोहन सिंह के इस प्रयोग का विरोधी भी कायल थे। मनमोहन सिंह की यही खासियत उन्हें 2004 में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ले गई। लेकिन 2015 आते-आते वही महान अर्थशास्त्री पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह आरोपी के कटघरे में खड़े हैं।

संयोग देखिए 2004 से 2009 के बीच तीन बार मनमोहन सिंह के पास कोल मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार था। इसी दौरान 155 कोल ब्लॉक्स आवंटित किए गए। यही आवंटन सवालों के घेरे में खड़ा हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ये कह कर रद्द कर दिया कि इससे देश को भारी नुकसान हुआ है। देश की आर्थिक स्थिति कमजोर करने में एक कड़ी मनमोहन सिंह को मानी गई। यहां तक कि उन पर अपराधिक साजिश से लेकर विश्वासघात तक के आरोप लगे हैं। 

यानी आठ अप्रैल को वो सीबीआई की विशेष अदालत में कठघरे में खड़े होंगे। वकील उनसे सवाल-जवाब करेगा। आरोप साबित हो पाता है या नहीं, ये बाद की बात है। लेकिन जो काले छींटे उनके ऊपर परे हैं, ये विद्वता के तमगे से सुसज्जित मनमोहन सिंह के लिए काफी परेशान करनेवाला है। यही वजह है कि कोर्ट से समन मिलने के कुछ ही घंटे बाद वो मीडिया के सामने आए। खुद को बेदाग, बेकसूर बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब तक सत्ता के शीर्ष पर बैठे रहे। उके ऊपर यही आरोप लगता रहा कि वो तो महज संकेत मात्र हैं। किसी और के इशारे पर काम करते हैं। किसी ने रोबोट कहा। किसी ने मौनी बाबा कहा। विरोधी अपने हिसाब से मनमोहन सिंह को परिभाषित करते रहे। पता नहीं कोल आवंटन के घालमेल में मनमोहन सिंह की सहमति थी या नहीं या थी तो कितनी थी। लेकिन जब कटघरे में खड़े होने की बारी आई तो वही 'रोबोट' आरोपियों के फेहरिस्त में शामिल हो चुका है। जिसके हाथ में रिमोट था, उसका कॉलर अभी भी सफेद है। दरअसल यही राजनीति की हकीकत है। यही सियासत का काला सच भी।

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