शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

राजनीति में मुर्दे कभी गाड़े नहीं जाते...

राजनीति में मुर्दे भी बड़े काम के होते हैं। इसलिए ये कभी गाड़े नहीं जाते हैं। इसे हमेशा जिंदा रखा जाता है। ताकि मुफीद वक्त पर काम आ सके। हमारे सियासतदानों ने सियासत के इस सूत्र का बखूबी इस्तेमाल किया है। खासकर चुनावी मौसम में जब राजनेता वैचारिक रूप से मर जाते हैं तो सालों पहले दम तोड़ चुके यही मुर्दे बोल पड़ते हैं। चिल्लाते हैं। वोट बटोरते हैं। सरकार बनबाते हैं।

एक बार फिर सरकार बनाने की बारी है। भ्रष्टाचार। महंगाई। गरीबी। घोटाला। विकास सरीखे मुद्दे हैं। देशभर की जनता महंगाई से हांफ रही है। भ्रष्टाचार से त्रस्त है। शहर से लेकर गांव तक, एक बड़ा तबका, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विकास से कोसों दूर है। लोग सरकार से एक मजबूत नीति की उम्मीद लगए बैठे हैं। एक ऐसी नीति जिसमें लोगों को भरपेट खाना मिल सके। सुकून की जिंदगी जी पाए। 

लेकिन हमारे सियासी गणित के आर्यभट्टों ने हिसाब लगाकर दंगों में मारे गए मुर्दों को जिंदा किया है। एक बार फिर मुर्दे बोल पड़े हैं। सड़क पर हंगामा मचा है। दंगों पर सियासी दंगल हो रह है। हत्या का हिसाब मांगा जा रहा है। बहुत हो चुका। अब माफी से काम नहीं चलेगा। गुनहगारों के लिए फांसी मांगी जा रही है।

29 बरस पहले भी एक दंगा हुआ था। लोकतंत्र की हत्या हुई थी। इंसानियत के पीठ पर खंजर घोंपा गया था। दिल्ली की सड़क खून से लथपथ हो गई थी। हजारों बेगुनाह मारे गए थे। दंगों में मारे गए उन मुर्दों को आज तक गाड़ा नहीं गया। सियासतदानों ने उसे जिंदा करके रखा। हर दल, हर पार्टी के नेताओं ने उन मुर्दों को जिंदा रखने के लिए जरूरत के हिसाब से केमिकल का इस्तेमाल किया। जब-जब जरूरत पड़ी उन मुर्दों को बाहर निकाला। उनका इस्तेमाल किया। और उसे रख दिया। एक बार फिर यही हो रहा है।

सिर्फ सिख दंगा नहीं। गुजरात दंगा। भागलपुर दंगा। कईं दंगे हैं। जिनकी फाइल चुनाव नजदीक आते ही खुल जाती हैं। करोड़ों लोगों के असली मुद्दे गौण जाते हैं। न्याय और अन्याय का हिसाब होने लगता है। नेताओं के पेटी से मुर्दे बाहर निकलते हैं।

यकीन जानिए। दंगों के असली गुनहगारों का कभी हिसाब नहीं होगा। उन मुर्दों के अपनों से सहानुभूति का ढोंग करनेवाले किसी भी दल के नेता, न्याय नहीं होने देंगे। जब तक न्याय नहीं होगा, मुर्दे कभी दफ्न नहीं होंगे। मुर्दे जिंदा रहेंगे और वैचारिक शून्यता में भटकनेवाले नेताओं के लिए रामबाण की तरह इस्तेमाल होते रहेंगे।


बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

नीतीश सर, प्लीज...

सीएम नीतीश जी,

आपके लाखों समर्थक चाहते हैं कि आप न्याय करेंगे। एक धर्मनिर्पेक्ष नेता होने के नाते उन इंडियन मुजाहिद्दीन के कथित आतंकी नौजवानों के पक्ष में केस लड़ें, जिन्हें पटना में बम प्लांट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। आप से उम्मीद की जाती है कि आप एनआईए और बिहार पुलिस को सख्त निर्देश देंगे कि बिहार की राजधानी को दहलाने के आरोप में जिन्हें गिरफ्तार किया गया है उनसे कस्टडी में जरूरत से ज्यादा पूछताछ ना हो। उन लड़कों से सख्ती ना बरती जाए।

आपका दिल बहुत बड़ा सीएम साहब। आप उन नौजवानों को जरूर बचाइएगा। उसके घरवालों से पूछिये। उसके चाहनेवालों से पूछिए। बताएंगे कि वे कथित आतंकी नौजवान निर्देष हैं। मैं जानता हूं सर, आपका दिल कहे या ना कहे लेकिन आपका दिमाग जरूर ये कह रहा होगा कि 22 साल, 25 साल के ये नौजवान आतंकी नहीं हो सकते। ये सब साजिश है। उसी सफेद दाढ़ीवाले नेता की चाल है। जिसने 2002 में खून खराबा करवाया था। जो खुद प्रधानमंत्री बनने के लिए आपके अरमानों पर पानी फेर दिया था। खैर छोड़िये, पीएम बनने-बनाने की चर्चा किसी दूसरी चिट्ठी में करेंगे। इस चिट्ठी में तो हम सर आपसे यही अनुरोध करेंगे कि उन नौजवानों को जरूर न्याय दिलाइएगा सर।

आप अभी तक गिरफ्तार आतंकियों के खिलाफ कुछ ना बोलकर इस बात का प्रमाण दे चुके हैं कि आप उनके लिए कुछ कर रहे हैं। अच्छी बात है। हमे उम्मीद है कि आप जल्द उन गिरफ्तार कथित आतंकियों के परिवारवालों से जाकर मिलेंगे। अगर समय ना मिला तो उन्हें अपने घर पर बुलाएंगे और उन्हें उनके बच्चों को बचाने का सांत्वना देंगे । लोक लाज की चिंता मत कीजिएगा। एक नेता के लिए वोट के आगे कुछ भी नहीं होता है। हालांकि ये हम क्या बताएं। आपसे ज्यादा भला और कौन जान सकता ये बात।

एक आतंकी का तो चाचा ही आपका करीबी है। आपके पार्टी का नेता है। बताइए तो सर आपकी पार्टी के नेता का भतीजा और भांजा कैसे आतंकी हो सकता है। आपके नये दुश्मन ने आपके खिलाफ बड़ी साजिश की है।

सर, आप पर भरोसा है कि आप उन तमाम साजिश का मुंहतोड़ जवाब देंगे। 6 लोगों की हत्या करने, 82 लोगों को जख्मी करने और पटना में दहशत फैलाने के आरोप में जिन्हें गिरफ्तार किया गया है, उसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे। उसे निर्दोष साबित करेंगे । और जो आपकी नजर में असली दोषी है, उसको फांसी पर लटकाने की सजा दिलवाएंगे।

पूर्व गृहसचिव किसी मीडिया को बता रहे थे कि आपने कथित आतंकी यासिन भटकल को बचाने के लिए भी यत्न किया था। आप ने भटकल जी की कस्टडी लेने से इनकार कर दिया था। वाकई सर, अगर आपने सही में ऐसा किया तो धन्य हैं आप। धन्य है आपकी राजनीति। कुछ दिन पहले की बात है, दूसरे राज्यों की पुलिस आकर जो आपके राज्यों से आतंकियों को गिरफ्तार कर ले जाते थे, उस पर भी जो आपने ऊंची आवाज के साथ विरोध दर्ज करवाया था, उसका तो कोई जवाब ही नहीं।

माफ कीजिएगा सर, चिट्ठी थोड़ी लंबी हो गई। क्या करें, आपने इन कथित आंतकियों को लेकर इतने बड़े-बड़े महान काम किया है कि आपसे उम्मीदें काफी बढ़ गई है। बाकी, राजनीति और पीएम बनने की बात दूसरी चिट्ठी में करेंगे।

                                 - एक धर्मनिर्पेक्ष जनता 

बुधवार, 28 अगस्त 2013

रुपए के दर पर सरकार

सत्ता की अट्टालिका पर बैठकर हमेशा अट्टाहस भरनेवाली सरकार के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। बार-बार पोंछने के बावजूद माथे से पसीने की बूंद टपक रही थी। रुपए के सामने मुंह लटकाए बैचेन खड़ी थी सरकार। पहली बार रुपए ने सराकर को इस हालत में देखा था। लिहाजा पूछ बैठा- बहुत बैचेन से दिख रहे हैं। सरकार, क्या हुआ आपको ?

सरकार- तुम पूछ रहे हो कि क्या हुआ। ये पूछो कि क्या नहीं हुआ।

रुपया- मतलब समझा नहीं, देश में इतना कुछ हो गया। इतनी बड़ी त्रासदी आकर चली गई। हजारों लोग मारे गए। पड़ोसी मुल्क हमारे जवानों के सिर काटकर ले गए। आप तो कभी इतने परेशान नहीं दिखे। फिर अचानक ऐसा क्यों ?

सरकार- उत्तराखंड की त्रासदी से बड़ी त्रासदी तो तुमने खड़ी कर दी है। क्यों ऐसा कर रहे हो?

रुपया- मतलब, मैंने क्या किया सरकार?

सरकार- तुमने क्या किया ? सब कुछ तो तुमने ही किया है। और कर भी रहे हो। क्यों इतना गिर रहे हैं। डॉलर उठता जा रहा है और तुम गिरते जा रहे हो। क्या स्थिति बना ली है तुमने अपनी।

रुपया- ओह, तो मेरे गिरने से आप परेशान हैं। पर, क्यों ऐसे ही गिरना-उठना तो लगा ही रहता। मेरा-आपका, सबका।

सरकार- तुम समझ नहीं रहे हो यार। क्या स्थति बनती जा रही है। गिर तुम रहे हो और दोष मुझ पर मढ़ा जा रहा है। टीवी चैनल, अखबार, ट्वीटर, फेसबुक, हर जगह मेरी फजीहत हो रही है। लोग कह रहे हैं  कि मैं तुम्हें संभाल नहीं पा रहा हूं। यहां तक कि तुम्हे गिराने का ठीकरा मेरे सिर फोड़ा जा रहा है। यार, अब तुम कुछ करो। मेरी इज्जत बचाओ। जिस काम के लिए मेरा नाम हुआ, वही आज खत्म होने वाला है। अगर तुम कुछ नहीं करोगे तो मेरी इज्जत का दिवाला निकल जाएगा। कुछ भी नहीं बचेगा।

रुपया- आप झूठ बोल रहे हैं सरकार। आपको इज्जत की नहीं अपनी कुर्सी की चिंता है। आपको डर है कि अगर मैं ऐसे ही गिरता रहा तो आप कुर्सी से नीचे गिर जाएंगे। और ऐसे गिरेंगे कि फिर उस पर बैठने लायक नहीं रहेंगे। अच्छा, एक बात बताइए कि जब आप गिर रहे थे तो मैंने तो कुछ नहीं कहा था। उल्टे आप गिर भी रहे थे और मुझे अपनी जेब में समेट भी रहे थे। जब जेब भरा तो घर में घुसा दिया। घर भरा तो बैंक में ठूंस दिया। कहां कहां नहीं सैर कराया मुझे। देश-विदेशों में। अब भुगतीए। अब मैं गिर रहा हूं- आप अपने घर में सिमटिए। वरना देश की जनता आपको समेट देगी।

रुपया का जवाव सुनकर सरकार का मुंह और लटक गया। कुछ और सवाल जवाब नहीं सूझ रहा था। उसने कहा भी तो सही था। एक गिरा हुआ शख्स भला दूसरे को क्या उठा सकता है। लिहाजा वैसे ही मुंह लटकाए लौट आए। 

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

लौज का रोमांस

लोगों ने प्राइवेट हॉस्टल के नाम को ओवरहॉलिंग करते-करते लॉज बना दिया। जो छोटे बड़े हर शहर के गली मुहल्ले में मिल जाएंगे। जहां रेगिस्तान की छाती पर हराभरा सुनहरा जंगल बसाने की ख्वाहिस लिए लाखों बच्चे रहते हैं।  

शुरू-शुरू में ये किसी सज़ा से कम नहीं होता। लेकिन मजबूरी इसे मजा में बदल देती है। शुरू होता है ज़िंदगी का एक नया ड्रामा। उस ड्रामे में सबकुछ है। इमोशन है। प्यार है। एक्शन भी और सबसे ज्यादा भविष्य के गर्भ में छुपा ज़िंदगी का सस्पेंस भी। जहां कई कठोर निर्णय खुद लेने पड़ते हैं। जहां हर कदम फिसलनदार ज़मीन पर रखना पड़ता है। खुद को खुद से संभालना पड़ता है।

धीरे-धीरे बच्चे इस लॉज को अपना सबकुछ बना लेते हैं। 12 बाइ 10 के रूम की तुलना मुकेश अंबानी की एंटिलिया से होने लगती हैं। एक ही कमरे में पूरा फ्लैट। एक तरफ मां सरस्वती का फोटो तो दूसरी ओर बलखातीइतरातीमुस्कुराती अर्धनग्नावस्था में किसी हिरोइन का पोस्टर। जो आशिकिया मिज़ाज को पुख्ता करता है। रूम पार्टनर पारिवारिक सदस्य हो जाता है। जिससे कभी रोटी की दोस्ती तो कभी भात का बैर। जो भी होबीमार पड़ने पर दवा तो वही लाकर देता है।

इस सब के बावजूद एक बात ख़ास होती है। वो ये कि यहां हर कोई एक दूसरे को निकृष्ट जीव समझता है। हर कोई एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। एक ऐसी सोच जनती है जहां खुद को क्रेजी साबित करने की होड़ लगी रहती है। फ्लर्ट करने की हसरत लिए सच्ची झूठी कहानी गढ़ी जाती है।

यहां के रहन-सहन में कोई बंधे बंधाये नियम नहीं होते। कोई कसाव नहीं होता। हर काम में स्वच्छंदता रहती है। एक बिखरी हुई सी अनियमितता रहती है। जहां हर दिन एक रूटीन चार्ट बनता है। शाम होते-होते उसमें परिवर्तन होना शुरू हो जाता हैअगले दिन रुटीन खत्म और अगले सप्ताह फिर से नया चार्ट बनकर तैयार हो जाता है।

मीडिल क्लास फैमिली के बच्चे यहां आकर मनी मैनेजमेंट में पक्के हो जाते हैं। दो हज़ार रुपये में पूरा महीना मैनेज करने की कला कोई इनसे सीखें। मेस चलाना है। ट्यूशन फी देनी है। कॉपी और किताब भी खरीदनी है। और फिल्म का खर्चा भी निकालना है। पैसा जोड़-जोड़ इकट्टा करके फिल्म देखने का उत्साहइंसा अल्लाह। रिलिजिंग डेट पर फिल्म देखने का मजा यहां के बच्चों से ज्यादा भला कौन जान सकता है। जेब में पैसा रहे ना रहेरूतबा तो मुमताज के शाहजहां वाला चाहिए ही। तभी लड़की भी पटेगी।

लॉज में दिन की शुरुआत बड़े ही मजेदार तरीके से होती है। आंख मलते हुए ट्वायलेट जाना। नंबर लगाना पड़ता है। क़िस्मत अच्छी रही तो जल्दीवरना कभी-कभी फिर से एक नींद सोकर उठ जाइयेतब नंबर आयेगा। तभी तो स्वयंभू स्मार्ट लड़के आठ बजे के बाद ही सोकर उठने की चालाकी करते हैं। लेकिन स्नान करने के समय तो यहां पूरा समाजवाद दिखता है। सिक्स पैक बॉडी की तमन्ना रखने वाले तमान बच्चे जब एक साथ नहाने के लिए जमा होते हैं तो देखते ही बनाता है।

गैस ने हॉस्टल में नई क्रांति ला दी। स्टोव की सनसनाहट बंद हो गयी। हांकुकर की सिटी जरूर आवाज लगाती है। एक ही साथ कई कमरे से आवाज निकलती है। एक ही बार में बीडीसी बनकर तैयार। बीडीसीयानी भातदालचोखा की छात्रप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं आई है। ये आज भी छात्रों का फेवरेट है। फटाफट एक ही साथ बनकर तैयार। मन किया तो छौंका लगा दियानहीं तो थाली भरकर भातउसके उपर आलू का चोखा और बाटी में दाल। खाते समय किसी फाइव स्टार होटल से कम स्वादिष्ट नहीं लगता। यहां के खाने में एक और ख़ासियत होता है कि यहां कुछ भी ज्यादा नहीं बनता। जो भी बनता हैसबका उदरभाजन हो जाता है।



खैरजो भी हो इस सब के बावजूद यहीं बुना जाता है जिंदगी का तानाबानासपनों में लगते हैं पंख। कोई इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करता है। कोई मेडिकल की परीक्षा पास करता है। यहीं कोई मैनेजमेंट की तैयारी का फैसला करता है, कोई सीए का तो कोई जेनरल कंपिटिशन में क़िस्मत आजमाने के लिए घुस जाते हैं। 

मंगलवार, 4 जून 2013

आडवाणी का दर्द-ए-कुर्सी और पार्टी का बंटाधार

भारतीय जनता पार्टी 2014 में सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने का सपना देख रही है। सत्ताधारी कांग्रेस ने उसको खुलकर मौका भी दिया है। भ्रष्टाचार, महंगाई, विदेश नीति सरीखे ऐसे मुद्दे हैं, जिसपर कांग्रेस बैकफुट पर है। बीजेपी अगर चाहे  तो इन्हीं मुद्दों के जरिए वो कांग्रेस को पटखनी देकर दिल्ली में सरकार बना सकती है।

बीजेपी को दिल्ली में सरकार बनाने का इससे बेहतर मौका शायद ही कभी मिले। लेकिन आपसी खींचतान की वजह से ये असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर लग रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है पीएम इन वेटिंग को लेकर आपसी कलह। पार्टी का एक बड़ा खेमा है जो खुले तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम ले रहा है। जबकि दूसरा खेमा लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है। मोदी को समर्थन करनेवालों की तदाद अधिक है, लिहाजा वे खुलकर उनका नाम ले रहे हैं। वे मोदी में पार्टी और देश दोनों का भविष्य देख रहे हैं। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी खुद को पीएम इन वेटिंग की रेस से अलग नहीं होना चाहते। यही वजह है कि पार्टी के भीष्ण पितामह का दर्द-ए-दिल रह रहकर बयां हो जाता है।   

पीएम इन वेटिंग को लेकर कई खेमे में बंटी बीजेपी के भीतर जारी किचकिच एक बार फिर उजागर हुई है। लालकृष्ण आडवाणी के बयान ने एक बार फिर बीजेपी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। आडवाणी ने पहले मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की तारीफ में कसीदे गढ़े। उसके बाद नितिन गडकरी को चुनाव प्रचार समिति का हेड बनाने का शिगुफा छोड़ दिया। आडवाणी के दोनों बयानों में अपरोक्ष रूप से निशाने पर नरेन्द्र मोदी थी। वही नरेन्द्र मोदी जो जो कभी आडवाणी के सारथी हुआ करते थे। लेकिन कुर्सी के मोह में फंसे आडवाणी को मोदी से ही खतरा लगने लगा है।  

राजनीति के घाघ खिलाड़ी आडवाणी खुलकर मोदी का विरोध भी नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन पार्टी में मोदी का बढ़ता कद उन्हें बर्दाश्त भी नहीं है। दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर गोलियां दाग रहे हैं। कभी सुषमा स्वराज, कभी शिवराज सिंह चौहान तो कभी नितिन गडकरी को आगे रखकर अपने दिल की भड़ास निकाल रहे हैं। लेकिन उन्हें ये अहसास नहीं है कि उनकी चलाई गोली से विरोधी नहीं उनकी अपनी बनाई पार्टी ही घायल हो रही है।

लालकृष्ण आडवाणी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि सक्रीय राजनीति में उनका समय अब खत्म हो चुका है। राजनीति में उन्होंने जो पौध लगाए थे, वे अब पेड़ बन चुके हैं। उन्हें अब आराम करने की जरूरत है। सक्रीय राजनीति को छोड़कर अगर वो अपने अनुभव से पार्टी के मेंटर के रूप में काम करेंगे तो उनका भी सम्मान होगा और पार्टी भी आगे बढ़ेगा। लेकिन आडवाणी सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि रह रहकर उनकी महत्वाकांक्षा बाहर निकल जाती है।


इसमें कोई दो राय नहीं कि लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के पुरोधा हैं। भारतीय राजनीति के वो एक ऐसे शख्सियत हैं जिन्होंने एक पार्टी को शून्य से लेकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया। लेकिन महान वही होता है, जो त्याग करता है। जो अंतिम क्षण तक दुश्मनों से भी सीखता है। आडवाणी को सत्ता का त्याग सोनिया गांधी से सीखना चाहिए। वह भी उस स्थिति में जब उनका उत्तराधिकारी कोई और नहीं बल्कि उन्हीं का चेला बना बन रहा हो। 

रविवार, 2 जून 2013

वे कैसा हीरो हैं ?

सब चुप हैं। बिल्कुल चुप। मानो जुबान को लकवा मार दिया हो। एक भी शब्द मुंह से नहीं निकल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे उन्होंने कुछ देखा या सुना ही नहीं। पद और पैसे की लालच में अंधे और बहरे हो गए हैं। बहुत दिनों से टीवी पर भी नहीं दिखे। पैसे लेकर मुफ्त में भाषण देनेवाले पता नहीं कहां चले गए हैं। शायद, सबकुछ देखकर, सुनकर और समझकर अज्ञातवास में चले गए हैं। शांति की खोज में। पता नहीं।

उनको क्रिकेट से और फिर क्रिकेट को उनसे पहचान मिली। कम से कम भारत में तो वे जरूर वो स्तम्भ माने जाते रहे हैं, जहां से क्रिकेट को नई दशा और दिशा मिली। जिनकी वजह से लोगों का क्रिकेट से लगाव बढ़ा। फिरंगियों के खेल में उन्हीं को मात देने का जज्बा उन्हीं से सीखा सबने। तो फिर जब क्रिकेट कंलकित हो रहा है, अब वे अपना जज्ब क्यों नहीं दिखा रहे हैं।

हिन्दुस्तान में क्रिकेट के दीवाने उन्हें अपना हीरो मानते हैं। उन्हें सम्मान करते हैं। उनकी बातों पर गौर करते हैं। उनसे सुनकर और उन्हें पढ़कर सीखते हैं। उन्हें देखने के लिए, उन्हें सुनने के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

ये सबकुछ है, क्रिकेट की वजह से। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस क्रिकेट ने उन्हें नाम दिया। पहचान दी। शोहरत और दौलत दिया। आज जब वही क्रिकेट भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा है। उस क्रिकेट का बीच चौराहे पर चीरहरण हो रहा है। तो वे कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। क्रिकेट के दीवाने टकटकी लगाए बैठे हैं उनकी ओर कि कब वे कुछ बोले। कुछ ऐसी बात कहें, जिसका सीधा असर हो। कुछ ऐसा करें जिससे क्रिकेट से लोगों का भरोसा न टूटे। क्रिकेट को कलंकित करनेवालों को सजा दिलाने के लिए मुहिम छेड़ें। लेकिन वे हैं जो चुप्पी साध बैठे हैं। बस, इसलिए कि उन्हें कॉमेन्ट्री का कंट्रैक्ट उन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों की वजह से मिलता है।


आप ही बताइए न तो फिर वे बड़े-बड़े खिलाड़ी कैसे महान हो सकते हैं। कैसे मान लूं मैं उन्हें अपना हीरो। कैसे चलूं मैं उनके नक्शे कदम पर। क्यों टीवी पर सुनूं मैं उनकी बकवास। जो हीरो होता है, वो बोलता है। सच और झूठ के समाने डटकर खड़ा होता है। वो चंद पैसों की लालच में अज्ञातवास में नहीं चला जाता ।   

रविवार, 19 मई 2013

क्रिकेट में फिक्सिंग का ‘A’ कनेक्शन


  क्रिकेट में स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में जिन तीन क्रिकेटरों को गिरफ्तार किया गया है, उसमें सबसे ज्यादा चर्चा श्रीसंत की हो रही है। स्वभाविक है, श्रीसंत वर्ल्डकप विजेता टीम के हिस्सा रह चुके हैं। श्रीसंत टेस्ट खिलाड़ी रह चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में श्रीसंत का कद इतना तो जरूर है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन इस सबसे अलग मेरी नजर बाकी दो क्रिकेटरों पर है। जिनके नाम अंकित चव्हाण और अजीत चंदीला है। ये अलग बात है कि इन दोनों की क्रिकेट में कोई खास पहचान नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग इन्हें नहीं जानते हैं। लेकिन एक बात है जो फिक्सिंग की दुनिया में इन्हें खास बनाती है। वो है इनके नाम।

दरअसल दोनों के नाम की शुरुआत अक्षर से होता है। और स्पॉट फिक्सिंग में भारतीय खिलाड़ियों की लिहाज से अक्षर विशेष महत्व रखता है। क्योंकि इन तीनों के अलावा जिस क्रिकेटर पर आईपीएल में फिक्सिंग का शक है, उसका नाम भी अक्षर से ही शुरू होता है। (आजिंक्य रहाणे)

इसके अलावा पुलिस ने अमित सिंह नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है, जो कभी गुजरात की रणजी टीम का हिस्सा था। आईपीएल खेल चुका है। लेकिन बेहतर क्रिकेटर नहीं बन पाया तो सट्टेबाज और क्रिकेटर का दलाल बन गया।

इसे इत्तेफाक कहिए या कुछ और। लेकिन उसका नाम भी अक्षर से ही शुरू होता है।

स्पॉट फिक्सिंग, भारतीय क्रिकेट और अक्षर का बेजोड़ समीकरण है। क्योंकि इससे पहले भी दावत, दौलत, औरत और शोहरत के चक्कर में जेंटलमैन खेल को शर्मसार करने का आरोप जिन दिग्गजों पर लगा उनके नाम भी  अक्षर से ही शुरू होता है।

टीम इंडिया के सबसे बेहतरीन कप्तान अहजरूद्दीन का कैरियर इसी फिक्सिंग की बजह से बर्बाद हुआ। अजहर पर दक्षिण अफ्रिका के खिलाफ मैच फिक्सिंग का आरोप लगा। उन्हें टीम से निलंबित कर दिया गया। क्रिकेट खेलने पर ताउम्र प्रतिबंध लग गया। हालांकि बाद में ये प्रतिबंध हटा। लेकिन जब तक वो खुद को बेकसूर साबित करते, तब तक उनका कैरियर खत्म हो चुका था।

कमोबेश ऐसा ही आरोप अपने जमाने के सबसे बेहतर बल्लेबाज अजय जडेजा पर लगा था। अजय का क्रिकेट जब पूरे फॉर्म में था, तभी उनपर भी फिक्सिंग का दाग लगा। जडेजा का कैरियर भी खत्म हो गया।

दोनों दिग्गजों के नाम की शुरूआत अक्षर से ही होता है।

जिस दौर में अहजरूद्दीन और अजय जडेजा पर फिक्सिंग का आरोप लगा था, उस समय एक और खिलाड़ी था, जो फिक्सिंग के फांस में फंसा था। उसका भी नाम अक्षर से शुरू होता है। नाम है अजय शर्मा। चूकि अजय शर्मा का कद अजहर और जडेजा के बराबर नहीं था, लिहाजा उनके नाम की जर्चा ज्यादा नहीं हुई।

क्रिकेट की कलंक कथा का सबसे काला अध्याय है फिक्सिंग। एक ऐसा पाप जिसने जेंटलमैन खेल को शर्मसार कर दिया। इसमें अक्षर के क्रिकेटरों का पूरा योग्दान है। मेरा नाम भी अक्षर से ही शुरू होता है। लेकिन राहत की बात ये है कि मैं क्रिकेटर नहीं क्रिकेट प्रशंसक हूं।