मंगलवार, 4 जून 2013

आडवाणी का दर्द-ए-कुर्सी और पार्टी का बंटाधार

भारतीय जनता पार्टी 2014 में सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने का सपना देख रही है। सत्ताधारी कांग्रेस ने उसको खुलकर मौका भी दिया है। भ्रष्टाचार, महंगाई, विदेश नीति सरीखे ऐसे मुद्दे हैं, जिसपर कांग्रेस बैकफुट पर है। बीजेपी अगर चाहे  तो इन्हीं मुद्दों के जरिए वो कांग्रेस को पटखनी देकर दिल्ली में सरकार बना सकती है।

बीजेपी को दिल्ली में सरकार बनाने का इससे बेहतर मौका शायद ही कभी मिले। लेकिन आपसी खींचतान की वजह से ये असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर लग रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है पीएम इन वेटिंग को लेकर आपसी कलह। पार्टी का एक बड़ा खेमा है जो खुले तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम ले रहा है। जबकि दूसरा खेमा लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है। मोदी को समर्थन करनेवालों की तदाद अधिक है, लिहाजा वे खुलकर उनका नाम ले रहे हैं। वे मोदी में पार्टी और देश दोनों का भविष्य देख रहे हैं। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी खुद को पीएम इन वेटिंग की रेस से अलग नहीं होना चाहते। यही वजह है कि पार्टी के भीष्ण पितामह का दर्द-ए-दिल रह रहकर बयां हो जाता है।   

पीएम इन वेटिंग को लेकर कई खेमे में बंटी बीजेपी के भीतर जारी किचकिच एक बार फिर उजागर हुई है। लालकृष्ण आडवाणी के बयान ने एक बार फिर बीजेपी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। आडवाणी ने पहले मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की तारीफ में कसीदे गढ़े। उसके बाद नितिन गडकरी को चुनाव प्रचार समिति का हेड बनाने का शिगुफा छोड़ दिया। आडवाणी के दोनों बयानों में अपरोक्ष रूप से निशाने पर नरेन्द्र मोदी थी। वही नरेन्द्र मोदी जो जो कभी आडवाणी के सारथी हुआ करते थे। लेकिन कुर्सी के मोह में फंसे आडवाणी को मोदी से ही खतरा लगने लगा है।  

राजनीति के घाघ खिलाड़ी आडवाणी खुलकर मोदी का विरोध भी नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन पार्टी में मोदी का बढ़ता कद उन्हें बर्दाश्त भी नहीं है। दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर गोलियां दाग रहे हैं। कभी सुषमा स्वराज, कभी शिवराज सिंह चौहान तो कभी नितिन गडकरी को आगे रखकर अपने दिल की भड़ास निकाल रहे हैं। लेकिन उन्हें ये अहसास नहीं है कि उनकी चलाई गोली से विरोधी नहीं उनकी अपनी बनाई पार्टी ही घायल हो रही है।

लालकृष्ण आडवाणी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि सक्रीय राजनीति में उनका समय अब खत्म हो चुका है। राजनीति में उन्होंने जो पौध लगाए थे, वे अब पेड़ बन चुके हैं। उन्हें अब आराम करने की जरूरत है। सक्रीय राजनीति को छोड़कर अगर वो अपने अनुभव से पार्टी के मेंटर के रूप में काम करेंगे तो उनका भी सम्मान होगा और पार्टी भी आगे बढ़ेगा। लेकिन आडवाणी सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि रह रहकर उनकी महत्वाकांक्षा बाहर निकल जाती है।


इसमें कोई दो राय नहीं कि लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के पुरोधा हैं। भारतीय राजनीति के वो एक ऐसे शख्सियत हैं जिन्होंने एक पार्टी को शून्य से लेकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया। लेकिन महान वही होता है, जो त्याग करता है। जो अंतिम क्षण तक दुश्मनों से भी सीखता है। आडवाणी को सत्ता का त्याग सोनिया गांधी से सीखना चाहिए। वह भी उस स्थिति में जब उनका उत्तराधिकारी कोई और नहीं बल्कि उन्हीं का चेला बना बन रहा हो। 

रविवार, 2 जून 2013

वे कैसा हीरो हैं ?

सब चुप हैं। बिल्कुल चुप। मानो जुबान को लकवा मार दिया हो। एक भी शब्द मुंह से नहीं निकल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे उन्होंने कुछ देखा या सुना ही नहीं। पद और पैसे की लालच में अंधे और बहरे हो गए हैं। बहुत दिनों से टीवी पर भी नहीं दिखे। पैसे लेकर मुफ्त में भाषण देनेवाले पता नहीं कहां चले गए हैं। शायद, सबकुछ देखकर, सुनकर और समझकर अज्ञातवास में चले गए हैं। शांति की खोज में। पता नहीं।

उनको क्रिकेट से और फिर क्रिकेट को उनसे पहचान मिली। कम से कम भारत में तो वे जरूर वो स्तम्भ माने जाते रहे हैं, जहां से क्रिकेट को नई दशा और दिशा मिली। जिनकी वजह से लोगों का क्रिकेट से लगाव बढ़ा। फिरंगियों के खेल में उन्हीं को मात देने का जज्बा उन्हीं से सीखा सबने। तो फिर जब क्रिकेट कंलकित हो रहा है, अब वे अपना जज्ब क्यों नहीं दिखा रहे हैं।

हिन्दुस्तान में क्रिकेट के दीवाने उन्हें अपना हीरो मानते हैं। उन्हें सम्मान करते हैं। उनकी बातों पर गौर करते हैं। उनसे सुनकर और उन्हें पढ़कर सीखते हैं। उन्हें देखने के लिए, उन्हें सुनने के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

ये सबकुछ है, क्रिकेट की वजह से। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस क्रिकेट ने उन्हें नाम दिया। पहचान दी। शोहरत और दौलत दिया। आज जब वही क्रिकेट भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा है। उस क्रिकेट का बीच चौराहे पर चीरहरण हो रहा है। तो वे कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। क्रिकेट के दीवाने टकटकी लगाए बैठे हैं उनकी ओर कि कब वे कुछ बोले। कुछ ऐसी बात कहें, जिसका सीधा असर हो। कुछ ऐसा करें जिससे क्रिकेट से लोगों का भरोसा न टूटे। क्रिकेट को कलंकित करनेवालों को सजा दिलाने के लिए मुहिम छेड़ें। लेकिन वे हैं जो चुप्पी साध बैठे हैं। बस, इसलिए कि उन्हें कॉमेन्ट्री का कंट्रैक्ट उन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों की वजह से मिलता है।


आप ही बताइए न तो फिर वे बड़े-बड़े खिलाड़ी कैसे महान हो सकते हैं। कैसे मान लूं मैं उन्हें अपना हीरो। कैसे चलूं मैं उनके नक्शे कदम पर। क्यों टीवी पर सुनूं मैं उनकी बकवास। जो हीरो होता है, वो बोलता है। सच और झूठ के समाने डटकर खड़ा होता है। वो चंद पैसों की लालच में अज्ञातवास में नहीं चला जाता ।   

रविवार, 19 मई 2013

क्रिकेट में फिक्सिंग का ‘A’ कनेक्शन


  क्रिकेट में स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में जिन तीन क्रिकेटरों को गिरफ्तार किया गया है, उसमें सबसे ज्यादा चर्चा श्रीसंत की हो रही है। स्वभाविक है, श्रीसंत वर्ल्डकप विजेता टीम के हिस्सा रह चुके हैं। श्रीसंत टेस्ट खिलाड़ी रह चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में श्रीसंत का कद इतना तो जरूर है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन इस सबसे अलग मेरी नजर बाकी दो क्रिकेटरों पर है। जिनके नाम अंकित चव्हाण और अजीत चंदीला है। ये अलग बात है कि इन दोनों की क्रिकेट में कोई खास पहचान नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग इन्हें नहीं जानते हैं। लेकिन एक बात है जो फिक्सिंग की दुनिया में इन्हें खास बनाती है। वो है इनके नाम।

दरअसल दोनों के नाम की शुरुआत ‘अ’ अक्षर से होता है। और स्पॉट फिक्सिंग में भारतीय खिलाड़ियों की लिहाज से ‘अ’ अक्षर विशेष महत्व रखता है। क्योंकि इन तीनों के अलावा जिस क्रिकेटर पर आईपीएल में फिक्सिंग का शक है, उसका नाम भी ‘अ’ अक्षर से ही शुरू होता है। (आजिंक्य रहाणे)

इसके अलावा पुलिस ने अमित सिंह नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है, जो कभी गुजरात की रणजी टीम का हिस्सा था। आईपीएल खेल चुका है। लेकिन बेहतर क्रिकेटर नहीं बन पाया तो सट्टेबाज और क्रिकेटर का दलाल बन गया।

इसे इत्तेफाक कहिए या कुछ और। लेकिन उसका नाम भी ‘अ’ अक्षर से ही शुरू होता है।

स्पॉट फिक्सिंग, भारतीय क्रिकेट और ‘अ’ अक्षर का बेजोड़ समीकरण है। क्योंकि इससे पहले भी दावत, दौलत, औरत और शोहरत के चक्कर में जेंटलमैन खेल को शर्मसार करने का आरोप जिन दिग्गजों पर लगा उनके नाम भी  ‘अ’ अक्षर से ही शुरू होता है।

टीम इंडिया के सबसे बेहतरीन कप्तान अहजरूद्दीन का कैरियर इसी फिक्सिंग की बजह से बर्बाद हुआ। अजहर पर दक्षिण अफ्रिका के खिलाफ मैच फिक्सिंग का आरोप लगा। उन्हें टीम से निलंबित कर दिया गया। क्रिकेट खेलने पर ताउम्र प्रतिबंध लग गया। हालांकि बाद में ये प्रतिबंध हटा। लेकिन जब तक वो खुद को बेकसूर साबित करते, तब तक उनका कैरियर खत्म हो चुका था।

कमोबेश ऐसा ही आरोप अपने जमाने के सबसे बेहतर बल्लेबाज अजय जडेजा पर लगा था। अजय का क्रिकेट जब पूरे फॉर्म में था, तभी उनपर भी फिक्सिंग का दाग लगा। जडेजा का कैरियर भी खत्म हो गया।

दोनों दिग्गजों के नाम की शुरूआत ‘अ’ अक्षर से ही होता है।

जिस दौर में अहजरूद्दीन और अजय जडेजा पर फिक्सिंग का आरोप लगा था, उस समय एक और खिलाड़ी था, जो फिक्सिंग के फांस में फंसा था। उसका भी नाम ‘अ’ अक्षर से शुरू होता है। नाम है अजय शर्मा। चूकि अजय शर्मा का कद अजहर और जडेजा के बराबर नहीं था, लिहाजा उनके नाम की जर्चा ज्यादा नहीं हुई।

क्रिकेट की कलंक कथा का सबसे काला अध्याय है फिक्सिंग। एक ऐसा पाप जिसने जेंटलमैन खेल को शर्मसार कर दिया। इसमें ‘अ’ अक्षर के क्रिकेटरों का पूरा योग्दान है। मेरा नाम भी अक्षर से ही शुरू होता है। लेकिन राहत की बात ये है कि मैं क्रिकेटर नहीं क्रिकेट प्रशंसक हूं। 

बुधवार, 15 मई 2013

मैं जेल जा रहा हूं !



मैं आप सबसे दूर जा रहा हूं। बहुत दूर। जहां न तो मेरी बीवी का बेइंतहा प्यार साथ होगा। न ही मेरे बच्चों का हंसता-खिलखिलाता दुलार होगा। ना ही मेरी बहनें मेरे साथ होगी और ना ही बुलंदी की असमीति ऊंचाई पर पहुंचानेवाले आप लोग होंगे। मैं उस जगह पर जा रहा हूं जहां सिर्फ मैं और मेरी तन्हाई होगी। अकेलापन होगा। यादें होंगी।

हर भूल का प्रायश्चित होता है। मैं भी प्रायश्चित करने जा रहा हूं, उस गलती का, जो नादानी में, अनजाने में मुझसे हो गया था। मैं उसी गुनाह की सजा भुगतने जा रहा हूं। मैं जेल जा रहा हूं। जहां आपके प्यार के भरोसे मुझे साढे तीन बरस बिताने हैं।

जेल में जिंदगी के साढे तीन बरस कम नहीं होते। बहुत कुछ बदल जाते है। इस दौरान बहुत कुछ सहना पड़ता है। अहसास है मुझे कि कैसे जेल में दिन बिताने पड़ते हैं। कैसे जिल्लतभरी जिंदगी जी जाती है वहां पर। पूरे डेढ़ साल रह चुका हूं मैं उस काल कोठरी में। जहां आजादी का कतराभर रौशनी नसीब नहीं होती। जहां पर बेबसी और लाचरगी ठहाके लगाती रहती है। और लोग बेचारे की तरह सबकुछ देखते रहते हैं।

इस बार पूरे साढे तीन बरस तक मैं सबसे दूर रहूंगा। मैं अपने परिवार को आपके भरोसे छोड़कर जा रहा हूं। मेरी बीवी, मेरे बच्चे आप ही के आसरे हैं। उम्मीद है, जरूर ख्याल रखेंगे आपलोग।
साढ़े तीन बरस कम नहीं होते उस औरत के लिए जिसका पति उससे इतना दूर हो कि चाहकर भी वो मिल न सके। जिसके साथ अपना दुख दर्द नहीं बांट सके। जिसने जिंदगी भर साथ निभाने का वादा करके उसे अपने घर लाया और अब उसके होठों पर सिसकियां और आंखों में आंसू छोड़कर खुद जेल चला गया।

जिंदगी के साढे तीन बरस कम नहीं होते उन नादान बच्चों के लिए जिन्हें अपने पिता का प्यार नहीं मिला। मेरे बच्चों को जिस उम्र में मेरे साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उसी वक्त मैं उससे दूर जा रहा हूं। जब मैं लौटकर आऊंगा तब तक मेरे बच्चे बड़े हो जाएंगे। वे स्कूल जा रहे होंगे। हो सकता है कि जब मैं अपना दाग धोने के बाद आजाद होकर दोबारा उनसे मिलूंगा तो वे मुझे पहचान भी ना पाएं। मेरे लिए कितना दर्दनाक होगा वो पल, जब मेरे बच्चे मुझे नहीं पहचान पाएंगे। सोच सोचकर मरा जा रहा हूं। मैं समझ रहा हूं। सिर्फ कानून का ही गुनहगार नहीं, अपने परिवार का भी गुनहनगार हूं मैं।

गुनहगार हूं मैं उनलोगों का जिनकी फिल्मों में मैं काम कर रहा हूं। मेरी वजह से कई फिल्में अधूरी रह गई। कई लोग बेरोजगार हो गए। कइयों की जिंदगीभर की कमाई दांव पर लगी है। अदालत से सजा मिलने के बाद जितना हो सका, मैंने किया। लेकिन जो नहीं हो सका उसके लिए मैं क्षमा मांगता हूं। मुझे उम्मीद है कि मेरी लाचरगी को आप जरूर समझेंगे।

मुझे यकीन है कानून पर। भरोसा है देश के संविधान पर । मैं इज्जत करता हूं इस देश का, जहां की मिट्टी में पलकर मैं बड़ा हुआ हूं। जहां के लोगों ने मुझे सिर आखों पर बिठाकर रखा। मैं इस देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश का सम्मान करने जा रहा हूं।

जब मैं लौटकर आऊंगा, तब तक बहुत कुछ बदल चुका रहेगा। मुझको लेकर लोगों का नज़रिया बदल जाएगा। लोगों की सोच बदल जाएगी। मुझको लेकर लोगों में सहानुभूति होगी। अपनापन होगा। और ज्यादा प्यार होगा। लेकिन नहीं होगा, तो बीचे के ये साढ़े तीन बरस। 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

आत्मविश्वास से ही जीत है!


गिरकर संभलना कोई उससे सीखे। अपने बिखरे हुए विश्वास को समेटना कोई उससे सीखे। हारकर जीतना कोई उससे सीखे। आलोचनाओं से सीखना कोई उससे सीखे। वक्त से लड़ना कोई उससे सीखे। वक्त बदला। हालात बदले। जो कल तक उसको पानी पी-पी कर कोस रहे थे। आज फिर वे उसकी तारीफों में कसीदे गढ़ रहे हैं।

महेन्द्र सिंह धोनी। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान। महेन्द्र सिंह धोनी के लिए पिछले डेढ़ बरस बेहद खराब रहा। जो शख्स आसमान में बुलंदियों की ऊंचाई से ऊपर उड़ रहा था, वो अचानक धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। देश को क्रिकेट में दो-दो विश्वकप दिलानेवाले कप्तान पर सवाल खड़े होने लगे। धोनी के फैसले पर। खेल पर। बॉडी लैंग्वेज पर। विश्वास पर। व्यवहार पर। हर स्तर पर धोनी की आलोचना होने लगी। मौका परस्त साथी भी साजिश रचने लगे। लेकिन धोनी ने हार नहीं मानी।  

विश्वकप जीतने के बाद जिस इंग्लैंड की टीम ने धोनी के आत्मविश्वास को तोड़ दिया था। उसी अंग्रेजों के खिलाफ धोनी ने नई शुरूआत की। वन डे में न सिर्फ खुद अच्छी पारियां खेली, बल्कि साथियों का भी आत्म विश्वास बढ़ाया।

फिर आई कंगारूओं की बारी। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चेन्नई में। चेपॉक स्टेडियम में टीम इंडिया के 4 विकेट आउट हो चुके थे। सचिन,सहवाग, मुरली, पुजारा ड्रेसिंग रूम लौट चुके थे। तब धोनी ने न सिर्फ खुद धुआंधार पारी खेली, बल्कि साथी खिड़ालियों का भी हॉसला बढ़ाया। धोनी ने बिखरी हुई टीम को समेटा। उन्होंने खुद एक ही दिन में 203 रन ठोक दिए। धोनी को कोहली, अश्विन, भुवनेश्वर जैसे युवाओं का साथ मिला। और धोनी के दिन लौट आए। चेन्नई के बाद हैदराबाद में धोनी के धुरंधरों ने फिर ऑस्ट्रेलिया को पानी पिला दिया। पारी और 135 रनों से करारी हार। पुजारा का दोहरा शतक। मुरली विजय का शतक। जडेजा और अश्विन की शानदार गेंदाबाजी।

अब फिर मैदान में वही हो रहा है, जो डेढ़ बरस पहले होता था। धोनी का हर फैसला सही होने लगा। बॉडीलैंग्वेज पर अब सवाल नहीं होते। आलोचकों को धोनी का आत्मविश्वास और व्यवहार अच्छे लगने लगे हैं। कप्तानी छोड़ने की सलाह देनेवाले सुनील गावस्कर फिर उन्हें 2019 तक कप्तान बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। टीवी स्टूडियों में बैठकर धोनी को कोसनेवाले स्वयंभू महान क्रिकेटर को अब जवाब नहीं सूझ रहा।


  

सोमवार, 4 मार्च 2013

लाचारी को कौन सुधारेगा?


बेचारा डीएसपी। लाचार। बेबस। निसहाय। सरकारी भीड़ का शिकार हो गया। मंत्री के गुर्गों ने उसे मार डाला। खाकी और खादी की टक्कर में खादी फिर भाड़ी पड़ी। खादी में छुपे गुंडों ने खाकीवाले की हत्या कर दी। वो चीखता रहा। चिल्लाता रहा। सरेआम। कानून का कत्ल हुआ। लेकिन किसी ने नहीं देखा। गणतंत्र में गनतंत्र से लड़नेवालों को मरते हुए देखने की हिम्मत किसी में नहीं। मौका-ए-वारदात पर वो कोई नहीं था, जिन्हें हिंद पर नाज है।

एक हंसता-खेलता परिवार बिखर गया। एक लड़की महज कुछ महीनों में विधवा हो गई। बूढे मां-बाप का सहारा खत्म हो गया। डीएसपी के अपने अब इंसाफ मांग रहे हैं। लेकिन इंसाफ देगा कौन। सरकार। वही सरकार जिसके मंत्री पर हत्या करवाने का आरोप लगा है। उसी मंत्री पर जिसके सामने किसी की नहीं चलती। वो अपने आप में सरकार है। राजा है। लोग उसे राजा भैया कहते हैं। यूपी के समाजवादियों के भैयाजी यानी अखिलेश यादव के भी भैया।

इंसाफ मांग रही डीएसपी की पत्नी से मिलने के लिए मुख्यमंत्री पहुंचे। सबसे पहले डीसपी की कीमत लगा दी। 25 लाख रूपये। फिर पेंशन दोगुना करने का वादा। और फिर पूरी घटना की सीबीआई से जांच कराकर दोषियों को कड़ी सजा दिलाने का दावा। उसी सीबीआई से जो सांप-सीढी के खेल में उलझी रहती है।

और इस सब के बीच डीएसपी की मौत पर हो रहा है खेल। वही गंदा खेल। जिसे राजनीति कहते हैं। बीएसपी-एसपी-कांग्रेस-बीजेपी। संसद से सड़क तक हंगामा। मौका मिला है। सब के सब पत्ते खेल रहे हैं। कोई कानून व्यवस्था का पत्ता फेक रहा है। तो कोई अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का पत्ता। मायावती डीएसपी की मौत का हिसाब मांग रही हैं। तो मुलायम सिंह यादव उन्हें फ्लैश बैक में ले जाकर आइना दिखा रहे हैं।

वैसे तो देश और समाज की रक्षा करनेवालों की कोई जाति या धर्म नहीं होती। लेकिन राजनीति के बिनानी सिमेंट उन्हें भी इनके बीच में मजबूत दीवार खड़ी कर देता है। कुछ नेता कह रहे हैं कि वो अल्पसंख्यक था इसलिए मारा गया। कुछ कहते हैं कि गरीब था इसलिए मारा गया। कुछ कहते हैं कि मंत्रीजी की जातिगत अदावत थी, इसलिए मरवा दिया।  

खैर, ये राजनीति है। मौकापरस्त हर लाश की लौ पर रोटी सेकने के आदी हो चुके हैं। इसबार भी वही कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि चालीस बरस का पढ़ा-लिखा नौजवान मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है। लेकिन लाचार है। बिगड़ी व्यवस्था को तो युवा सुधार सकता है, जो डीएसपी सुधार रहा था। लेकिन लाचारी को कौन सुधारेगा?

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

नेताजी की परेशानी


नेताजी बहुत दुखी हैं। माथा पकड़ कर बैठे हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें। पता नहीं, किस राशि और लग्न में गृहमंत्री पद की शपथ ली थी। वो कौन सा काल था, जब मैडम के मन में उन्हें गृहमंत्री बनाने का ख्याल आया था। सोच-सोचकर परेशान हो जाते हैं नेताजी। रात-रातभर 
नींद नहीं आ रही है। आजकल अक्सर बीपी और शूगर बढ़ा रहता है।

जब से गृहमंत्री बने हैं, तब से एक से छुटकारा मिलता नहीं कि दूसरी परेशानी मुंह बाये खड़ी हो जाती है। कभी जुबान धोखा दे जाती है। तो कभी देश के शैतान। किस-किस को संभालें। कहां-कहां ध्यान दें। उमर हो चुकी है। बोलते-बोलते कभी जुबान लड़खड़ा जाती है। तो कभी फिसल जाती है। याद नहीं रहता है कि हमले की सूचना मिलने पर सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद करने के लिए कहा कि नहीं।  

पिछले शीतकालीन सत्र में संसद में बयान देते वक्त मोस्ट वांटेड आतंकी को ‘श्री हाफिज सईद’ कह दिया था। भूल सुधार हुई। गलती मानी। लेकिन कुछ ही दिन बीता था कि दिल्ली के दरिंदों ने सत्यानाश कर दिया। देश की राजधानी में सुरक्षा को लेकर थू-थू हुई। शैतानों ने जवाब देने लायाक नहीं छोड़ा। यहां तक कि अपनी ही पार्टी की सीएम ने भी नेताजी पर ठीकरा फोड़ दिया।

काफी हो हंगामे के बाद किसी तरह मामला दबा। तो जुबान दगा दे गई। ऐसी बात मुंह से निकल गई कि अपनों ने भी साथ नहीं दिया। एक-एक कर सब छोड़ गए। बीजेपी-आरएसएस वालों ने मोर्चा खोल दिया। अंत में लिखित माफी मांगी तब जाकर कहीं छुटकारा मिला।

नेताजी चैन की सांस लेते, उससे पहले ही आतंकियों ने सब गुड़ गोबर कर दिया। दो-दो ब्लास्ट कर दिये। देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। नेताजी क्या जवाब देंगे। संसद में जवाब दिया तो उस पर भी सवाल होने लगे। क्या करें नेताजी। ऐसे वक्त में तो मैडम भी साथ नहीं दे रहीं।

अच्छा काम भी करते हैं तो कोई सराहना नहीं मिलती। बल्कि उस पर भी सवाल होने लगते हैं। अपनी धाक जमाने के लिए नेताजी ने वो कर दिखाया, जिसके बारे में उनसे बड़े दिग्गज सिर्फ बातें हीं करते थे। दो-दो आतंकियों को फांसी पर लटका दिया। इतना महान काम करने के बाद भी वाह-वाही होने के बदले उसपर भी सवाल हो रहे हैं। अफजल के घरवालों को पहले ही सूचना क्यों नहीं दी। स्पीड पोस्ट के बजाय मोबाइल से क्यों नहीं बताया। वगैरह-वगैरह।