मंगलवार, 10 नवंबर 2015

कुत्तों के 'अच्छे दिन' आ गए !

भले ही कुत्ते को इंसान ने सबसे पहले पालतू बनाया हो। लेकिन इतना सम्मान आज तक कभी नहीं मिला। मनुष्यों के संपर्क में आने से लेकर अब तक कुत्ता सिर्फ कुकुर था। पालतू जानवर था। जो लोगों पर भौं-भौं करता था। जो अपने मालिक के आगे-पीछे दूम हिलाते फिरता था। लेकिन कुत्ता अब वो कुकुर नहीं रहा जो आप समझते रहे हैं। कुत्तों के अच्छे दिन आ गए हैं। कुत्ता प्रजाति अपने स्वर्णिम काल में प्रवेश कर चुकी है। 
कुत्ते की कितनी प्रजातियां हुई। जगंली से हाई ब्रिड हो गया कुत्ता। घर में पलंग पर सोने लगा कुत्ता। गाड़ी में घूमने लगा कुत्ता। कुत्तों को अंग्रेजी का नया-नया नाम मिला। लेकिन इस राज में जो सम्मान हासिल हुआ है, वो कभी नहीं हुआ। पहली बार इतने बड़े नेता, अभिनेता से कुत्ते की तुलना हो रही है। कुत्ते का कद बढ़ रहा है।

नाम तो धर्मेंद्र ने भी लिया था कुत्ते का। लेकिन वो नेगेटिव था। फिल्मी था। रमेश सिप्पी ने कुत्ते के नाम का सिर्फ इस्तेमाल किया। कुत्ते का नाम लेकर पैसा कमाया लेकिन सम्मान नहीं दिया। बसंती को नाचने तक से मना करवा दिया था रमेश सिप्पी ने। लेकिन 40 बरस बाद आज कुत्ता इतरा रहा है।

गुरूड़ हो भी क्यों ना। दुनिया की सबसे बड़ी सियासी पार्टी के बड़े नेता, उसके सांसद, अभिनेतामय नेता की तुलना कुत्ते से हो रही है। देश के बड़े-बड़े मंत्री, सत्ताधारी दल के नेता के मुंह से अपना नाम सुनकर कुत्ता अह्लादित हो रहा है। भाव विभोर होकर एक बुजुर्ग कुत्ते ने अपने बच्चों को एक किस्सा भी सुनाया कि कैसे एक मुख्यमंत्री ने आदर के साथ उसका नाम लिया जो प्रधानमंत्री बन गया। 

धन्य हिंदुस्तान। धन्य लोकतंत्र। और धन्य यहां के नेता। जिन्होंने कुत्ते को इतनी अदब बख्शी है। कुत्ता समाज इस सम्मान से अभिभूत है। जब तक सूरज चांद रहेगा। कुत्तों के देह में प्राण रहेगा। तब तक माननीयों के लिए कुत्तों के दिल में सम्मान रहेगा। अब कृतज्ञ कुत्ता समाज इन माननीयों को सम्मानित करेगा। कुत्तों का मान बढ़ानेवाले माननीयों को कुत्ता रत्न दिया जाएगा।

हालांकि कुछ पलटू नेताओं से कुत्ता समाज नाराज है। सरकार को ज्ञापन सौंपने वाला है। सियासत के इस कुत्ता काल में किसी कुत्ते को कुकुर समझने की भूल न करें। कुत्ता अब कुछ दिनों में कुत्ता जी होनेवाला है। इसलिए उसके स्वाभिमान पर चोट करना बंद हो। अगर एक बार किसी की तुलना कुत्ते से कर दी तो कर दी। फिर पलट नहीं सकते। कुत्ता समाज ने मांग की है कि इन पलटू नेताओं पर कड़ी कार्रवाई को लेकर कानून में संशोधन का प्रस्ताव संसद में पास हो।

रविवार, 8 नवंबर 2015

लालू हैं अब साथ में...नीतीश जी संभलना !

यूं तो पांचवीं बार लेकिन सीधे तौर पर देखें तो लगातार तीसरी बार नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। लोगों ने प्रचंड बहुमत दिया है। उम्मीद है कि वो कुछ बेहतर करेंगे। जाहिर है ताज के साथ-साथ नीतीश कुमार के सामने चुनौतियों का अंबार भी है। नीतीश कुमार को हर डेग संभालकर उठाना होगा।

पिछली बार जब एनडीए के साथ नीतीश कुमार थे तो इससे कहीं ज़्यादा सीटें मिली थी। अपेक्षाकृत लोग ज्यादा आश्वस्त भी थे। लेकिन इस बार चूकि वो लालू यादव के साथ हैं। लोगों के लिए लालू यादव के राज का अनुभव बहुत सुखद नहीं रहा है। लिहाजा लोग थोड़े बहुत आशंकित जरूर रहेंगे।

जिस तरह से जंगल राज की बात ज़ोर-ज़ोर से उछाली गई थी, इससे साफ है कि दिल्ली की मीडिया की नज़र भी नीतीश के इस शासनकाल पर पैनी रहेगी। खासकर सोशल मीडिया में नीतीश के कार्यकाल को हर दिन कसौटी पर कसा जाएगा। फिलहाल चाहे जो लगे, लेकिन इस कसौटी पर खरा उतरना नीतीश कुमार के लिए बड़ी चुनौती होगी।

नीतीश के इस सफर में पग-पग कांटें होंगे। क्योंकि अगले 5 साल तक अब लोगों का देखने का नज़रिया अब बहुत अलग होगा। अगर कहीं भी छोटी-मोटी घटनाएं होंगी। आपसी रंजिश में गोलियां चल जाएगी। मर्डर होगा। चोरी, डकैती, या लूट जैसी वारदात दो-चार एक साथ हो गई, तो इसे सीधे  जंगल राज से जोड़ा जाएगा।  लोग कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करेंगे।

अगर अपहरण की एक-दो घटनाएं हो गई। तो कहा जाएगा कि बिहार में फिर अपहरण उद्योग खुल गया। अगर कोई बिना बताए कोई 5 घंटे तक घर नहीं पहुंचा तो लोगों को किडनैप कर लिए जाने की आशंका होगी। और ये तमाम बातें मेन स्ट्रीम मीडिया से अलग सोशल मीडिया पर किस तरह चंद सेकेंड के भीतर विश्लेषण के साथ पसरती चली जाती है ये नीतीश कुमार भी अच्छी तरह जानते हैं और अब लालू यादव भी जान गए होंगे।

क्योंकि मोदी सरकार को लेकर भी ऐसा ही कुछ माहौल है। देश में कहीं भी, कभी भी, किसी भी मुस्लिमों को चोट आती है तो उसे सीधे मोदी से जोड़ दिया जाता है। क्योंकि मोदी सरकार या उनकी पार्टी मुस्लिमों को लेकर हमेशा संदेह में रही है। आरएसएस से जुड़े कुछ संगठनों के कार्यकर्ता उद्दंडता के चरम पर हैं। यही माइनस प्वॉइंट लालू यादव के साथ भी है। वो चाहे कितना भी विकास की बात कर लें, उद्दंडता को लेकर वो, उनकी पार्टी के कार्यकर्ता हमेशा संदेश के घेरे में रहे हैं। छोटी-मोटी घटनाओं को लेकर भी उनके ऊपर सवाल खड़े होंगे। 


एक बात और तथाकथित मोदी भक्त से ज्यादा खतरनाक हैं तथाकथित लालू भक्तमोदी भक्त तो जुबानों से वार करते हैं। लेकिन लालू भक्तों का इतिहास रहा है कि वो मुंह के साथ-साथ हाथ और लात का भी इस्तेमाल करते हैं। जाहिर है, इन भक्तों को संभालना नीतीश कुमार के लिए बड़ा टास्क होगा। 
खुद को हिंदुओं का ठेकेदार कहनेवाले हिंदू सेना सरीखे बेलगाम संगठन जिस तरह से मोदी सरकार के लिए परेशानी की वजह है, उसी तरह लालू भक्तों का झुंड नीतीश कुमार को परेशान करेगा।

इसके अलावा, विकास को भी रफ्तार देना होगा। रोजगार के विकल्प को सतह पर लाना होगा। अस्पतालों की स्थिति सुधारनी होगी। 10 सालों के शासनकाल में जो नहीं कर पाए। उसे करना पड़ेगा। यानी काम बहुत है। हर लिहाज से। कांटों के बीच से नीतीश को रास्ता निकालकर आगे 5 साल तक मुस्कुराते हुए संभलकर चलना होगा। जो आसान नहीं है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

दाल के बारे में सोचने का नहीं!


मैं दाल के बारे में कभी नहीं सोचता। बढ़ गई कीमतें तो बढ़ गई। नहीं खाऊंगा। लेकिन इसके बारे में सोचूंगा नहीं। बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि अगर सोचा तो चिंता जाग जाएगी। और चिंता में फंसा तो चतुराई चली जाएगी। चतुराई गई तो दुख होगा। और दुख हुआ तो शरीर घटेगा। और शरीर अगर घटते-घटते माइनस में चला गया तो सबकुछ खत्म। जब खुद नहीं बचूंगा तो सस्ती दाल मिलकर भी क्या होगा। सो, मैं दाल की बढ़ती किमतों के बारे में नहीं सोचता।

जिनको दाल के बारे में ज्यादा सोचना है वो सोचते नहीं। वो सोचते तो दाल भी मुद्दा होता। लेकिन नहीं है। उनके लिए दाल से ज्यादा जरूरी बीफ है। गाय है। जाति है। धर्म है। आरक्षण है। वोट है। चुनाव है। चुनाव तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है। पर्व है तो खुशी है। खुशी के वक्त में ग़म की बातें नहीं की जाती। इसलिए शायद वो भी चुनाव में बढ़ती दाल की बातें नहीं कर रहे हैं।

जब उनको दाल की चिंता नहीं है तो लोग क्यों करें। जब दाल के नाम पर वोट नहीं मांगे जा रहे हैं तो लोग भी दाल के नाम पर वोट क्यों दे। जिस पर नेता बोलें वही मुद्दा है। उसी मुद्दे पर मीडिया में चर्चा होती है। जिसकी चर्चा मीडिया में होती है वही लोग समझते हैं। उसी पर लोग मंथन करते हैं। उसी पर वोट देते हैं।

हां, दाल को लेकर वे लोग जरूर थोड़ी-बहुत चिंतित हैं, जिनके पास काम नहीं है। जो कुर्सी से दूर हैं। जिन्हें सत्ता चाहिए। जो बड़ा नेता बनना चाहते हैं। जो अब तक ये सोच रहे हैं कि जैसे दिल्ली में कभी शीला दीक्षित को आलू-प्याज के नाम पर कुर्सी मिल गई थी। वैसे ही शायद किस्मत चमक जाए। यही सोच-सोचकर मेहनत करते हैं। 10-20 को जमाकर प्रदर्शन करते हैं। कैमरा का फ्लैश चमका। फिर गायब हो जाते हैं। यानी सिरियसली वो भी नहीं लेते हैं।

कुल मिलाकर देश में दाल कोई मुद्दा नहीं है। किसी के लिए नहीं। कोई इसके बारे में सोचता नहीं है। आप भी मत सोचिए। विकल्प में जो मिलता है वो खाइए। आजकल कहीं न कहीं पार्टियां होती रहती है। कहीं बीफ पार्टी। कहीं दूध पार्टी। कहीं पॉर्क पार्टी। आप भी उसमें सरीक होइए। मुफ्त में खाइए। खुश रहिए। लेकिन सोचिएगा मत।


शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

मैं अखलाक़ बोल रहा हूं।

मैं अखलाक़ हूं। नाम तो सुना ही होगा आपने। आज कल हर जगह मेरी ही चर्चा है। हर जुबां पर मेरा नाम है। टीवी पर। अखबार में। सोशल मीडिया में। वहां भी, जिसके बारे में जिंदा रहते मैंने कभी सुना भी नहीं। सियासत के स्याह कमरे में मेरे ही नाम का च़राग जल रहा है आजकल। विचारों के दिवालियापन का शिकार हो चुके, अंधेरे में घिरे हर सियासतदां, मेरे ही नाम की रौशनी के आसरे आगे का सफर तय करने में जुटे हैं। इस रौशनी को बांटने के लिए भी लड़ रहे हैं हमारे रहनुमा। हर कोई अपने हिस्से में पूरा समेट लेना चाहता है मुझे। ग़जब़ हाल है।

कल तक किसी को मेरा ख्याल नहीं था। मैं कौन हूं। क्या हूं। क्या करता हूं। कैसे रहता हूं। किसी को कोई मतलब नहीं था। गुमनाम पते पर मुफलिसी के मकान में अपने परिवार के साथ जिंदगी बिता रहा था। अचानक मेरी मौत ने मुझे मेरे मजहब का मान बना दिया। आज मैं किसी का सगा हो गया। किसी का अपना हो गया। हर किसी को मेरे परिवार की फिक्र होने लगी।   

गरीबी में पूरी उमर गुजर गई मेरी। क्या बताऊं अपने बारे में। मीडिया वाले तो सबकुछ बता ही रहे हैं। बाकी तो मेरे घर की तस्वीर देखकर अंदाजा लग गया होगा। गुमनामी के अंधेरे में रोज लड़ते-लड़ते अपने परिवार का पेट भरता था। किसी को मेरी जरूरत से मतलब नहीं। आज मेरी मौत पर मातम मनानेवालों की कतार लगी है। मैं जानता हूं क्यों।

अगर मैं बीमारी से मर गया होता, तो भी क्या ये टोपी वाले हजारों किलोमीटर का सफर तय कर मेरे घर आते ? अगर मैं किसी हादसे का शिकार हो जाता तो भी क्या मुख्यमंत्री चेक और शोक संदेश भिजवाते ? अगर मेरा भाई, मेरा बेटा मेरी जमात का कोई कातिल मेरा कत्ल कर देता, तो भी क्या केंद्रीय मंत्री, बड़े-बड़े अफसर मेरे घर यूं आते? नहीं। बिल्कुल नहीं आते। ये सब सियासी हिसाब का जोड़-घटाव करने के बाद मेरे घर आएं हैं।

मैं कैसे समझाऊं इन्हें। कैसे बताऊं मैं सरकार को। जिनके मंत्री मेरे घर पर मातम में शरीक होने के लिए आते हैं। जिन्हें मेरी मौत अब भी हादसा लगता है। चारों तरफ से घेर लिया थे हमे। कातिलों ने रात के अंधेरे में। जब खिड़की और दरवाजा पीटना शुरू किया। सहम गया था। मेरा पूरा परिवार। रहम की भीख मांगते रहे हम। उन्होंने पीट-पीटकर मार डाला मुझे। मेरे परिवार पर लाठियां बरसाई। लाउडस्पीकर पर ऐलान करने के बाद वे मेरी हत्या करने आए थे। और आपको लगता है कि हादसा था।

मैं पूछना चाहता हूं उन्हें, जिन्होंने मेरा कत्ल कर दिया। पिछले 40 बरस में कभी मुझे गाय का मांस खाते नहीं देखा। उसदिन अचानक कैसे देख लिया। मेरे घर आते थे कपड़ा सिलवाने। कभी नहीं देखा। ईद और बकरीद में हर बरस मिलते थे। इस खुशी के दिन भी मेरे घर में कभी गाय का गोश्त नहीं देखा। आज कैसे नज़र पड़ गई। रात के अंधेरे में कैसे मैं नापाक हो गया। सियासी चश्मे ने मुझे काफिर बना दिया। कितने बड़े बुजदिल निकले यार तुम लोग भी। मुझे मारने के लिए मंदिर के लाउडस्पीकर से ऐलान करना पड़ा। सच बताऊं। तुम्हारे धर्म को तो तुम लोगों से ही सबसे बड़ा खतरा है।

और इन टोपी वालों को कैसे बताऊं। दाढ़ीवालों को कैसे समझाऊं कि मेरे परिवार को बचानेवाले भी वही हिंदू थे। उन वहशियों के सामने मैं और मेरा परिवार अकेला था। कुछ हिंदू भाइयों ने ही तो मेरे परिवार की इज्जत बचाई। उनकी जान बचाई। वरना, वे दरिंदे तो सबकुछ बर्बाद कर देते। मुझे पता है कि न तो आप उस वक्त बचाने आए थे। और न ही, आगे कभी बचाने आएंगे। गुश्ताखी माफ कीजिएगा। इतिहास बता रहा है कि आपका चरित्र कैसा है।

मेरे नाम का मतलब समझते हैं आप। अख़लाक़ का मतलब होता है अच्छा चरित्र। लेकिन उन हैवानों ने मुझे मेरे चरित्र के बारे में सफाई देने का भी वक्त नहीं दिया। सच कहूं तो मेरी मौत के बाद भी लोग मेरे चरित्र की परिभाषा अपने-अपने हिसाब से गढ़ेंगे। अपनी-अपनी सहूलियत के मुताबिक। खैर। कोई बात नहीं। मायावी दुनिया की यही हक़ीक़त है।

अंत में सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि मैं सिर्फ मोहरा था। बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा बना दिया गया था मैं। संभल जाइए आपलोग। यूपी में चुनाव होनेवाला है। आगे ऐसे कई मौके आएंगे। फिर कोई अखलाक होगा। या फिर कोई आकाश होगा। फिर कभी किसी मंदिर के लाउडस्पीकर से ऐलान होगा। किसी मस्जिद से आवाज आएगी। उस आवाज के पीछे हैवान बनकर मत दौड़िए। उन्हें हमारी मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे परिवार को फर्क पड़ता है। हमारी मौत के बाद। हमारे बिखरे हुए भरोसे का फायदा उठाकर वो टीवी पर, कैमरे के सामने यूं ही प्रवचन देते रहेंगे। वोट बटोरते रहेंगे। और हमारा परिवार दर-दर की ठोकरें खाता रहेगा। आंखें खोलिए। संभल जाइए।

मोहम्मद अखलाक़

सोमवार, 14 सितंबर 2015

अपनों को समझना जरूरी है!

बिना माँ बाप के बच्चे मतलब शैशवा अवस्था में जिसकी माँ मर गई हो, वाल्या अवस्था में बाप साथ छोड़ गया हो वो वक्त की ठोकर खा-खा कर इतना क्रूर हो जाता है कि समय आने पर उसके स्वयं के बच्चे और पत्नी भी उसके साथ रहने को अपनी मज़बूरी समझने लगते हैं। कोई भी उसके अंदर की भावना को प्यार और इच्छा को समझने की कोशिश नहीं करता क्योकि सभी को केवल अपनी जरूरतों से मतलब होता है जिसकी पूर्ति का वो व्यक्ति साधन मात्र है। चाहे वो पत्नी हो या फिर बच्चे। वो व्यक्ति अगर अच्छे बुरे की बात को लेकर अगर कुछ कहता भी है तो सभी को ऐसा लगता है कि वो जबरदस्ती उसपर थोपी जा रही है। इसका कारण है उस व्यक्ति की क्रूरता जिसकी वजह से उसकी आवाज इतनी तेज होती है कि सभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये बिना सहम कर चुप  लगा जाते हैं। नफरत करने लगती है और बच्चे मज़बूरी बस दूरी बनाते हुये सहमी जिंदगी जीते रहते हैं, दुनिया उसे अकड़ू और बद्तमीज कहती है परंतु कोई भी उसे समझने की कोशिश नहीं करता। परिणाम होता है व्यक्ति के जीवन में अकेलापन उसे खोखला बना देती है और वो संबेदनाहीन हो जाता है। यही सिलसिला जब लंबी हो जाती है तो व्यक्ति अपने कर्तव्य के निर्वहन से बिमुख हो कर अपनी जीवन लीला ख़त्म कर लेता है।
 
आज काफी उधेर बुन के बाद मेरे समझ में ये आया कि मैं कभी भी ना एक अच्छा पति बन सकता हूँ और ना ही एक अच्छा पिता और ना ही एक अच्छा नागरिक। ये मैं इसलिये लिख रहा हूँ, ताकि मेरे जैसे व्यक्ति जो मेरी तरह की जिंदगी जी रहे हैं वो अपनी क्रूरता पर नियंत्रण कर अपने स्वभाव को बदल कर अपनों के करीब रहकर उनका प्यार पा सकें। मेरा तो भगवन ही मालिक है कमसे कम आप तो अपना मालिक अपने बच्चों और पत्नी को बनने दें। क्योंकि मैं उस जगह पर पहूंच गया हूँ जहाँ से बदलाव मुश्किल है फिर भी कोशिश जारी रहेगी।
 
भगवन से प्रार्थना है कि अगर बच्चों को जन्म दिया है तो उससे उसके माँ बाप को बड़े होने तक अलग मत करना ताकि उसे माँ-बाप के प्यार का एहसास अपने माँ-बाप बनने तक पता रहे और वो भी अपने बच्चे और पत्नी को भरपूर प्यार दे सके। जिसका एहसास उन्हें भी हो। मैं भी अपनी पत्नी को और बच्चों को बहुत प्यार करता हूँ उसके बगैर जीने की सोच भी नहीं सकता लेकिन इसका एहसास मैं उन्हें नहीं दिला पता जिसके वजह से कभी कभी जीवन निरर्थक लगता है। फिर भी मैं लड़ता रहूँगा और अपनों में विश्वास जगाने की कोशिश करता रहूँगा।
 
इसे पढ़ने वालों से निवेदन है कि जिस तरह पिता की जिम्मेदारी परिवार को मजबूत, सुशिक्षित, और सम्माननीय बनाना होता है उससे भी ज्यादा जरुरी अपने प्रति उनके प्यार का एहसास जगाना होता है ताकि वो अपनी बात खुल कर आपके सामने रख सकें और आपसे विचार विमर्श कर सके नाकि दहशत में रह कर कुढ़ते और घुटते रहें और धीरे-धीरे सभी आप से दूर चले जाएँ और आपसे नफरत करने लगें।
 
धन्यवाद.........सोमेन्द्र।

शनिवार, 5 सितंबर 2015

कलाम के बहाने टीचर्स-डे !

टीचर्स डे पर डॉक्टर कलाम याद आए हैं। जो जिंदगी भर सीखते-सिखाते रहे। पढ़ाते रहे। लेकिन उन्होंने अपने गुरुओं से क्या सीखा। गुरू बनकर उन्होंने लोगों को क्या सिखाया। देश को क्या दे पाए। कुछ नहीं। न खुद सीख पाए। न किसी को सिखा पाए। ज्ञान। विज्ञान। वो मिसाइल। वो उपग्रह। वो पोखरण। वो परमाणु बम। सब बकवास था।

गीता के श्लोक भी पढ़े। कुरान की आयातें भी पढ़ी। विज्ञान की मोटी-मोटी किताबों को खंगाल गए। मरने से चंद घंटे पहले तक वो किताब के पन्नों में उलझे रहे। लेकिन इतना नहीं सीख पाए कि इंसान बनने से लोग महान नहीं होता। हिंदू या फिर मुसलमान बनना पड़ता है। उन्होंने हिंदुस्तान में पैदा लिया है। यहां के लोग विज्ञान पढ़कर-पढ़ाकर महान नहीं होते। यहां धर्म की व्याख्या करना महानता है। उस पर राजनीति करने पर याद किए जाते हैं। इंसानियत का पाठ पढ़ने के चक्कर में कुछ नहीं सीख पाए।  मरने के बाद सम्मान मिलता है। लेकिन डॉक्टर कलाम को मरने बाद ज्ञान मिला है।

डक्टर कलाम जिंदगी भर शहर-शहर घूमकर लोगों को पढ़ाते रहे। ज्ञान और विज्ञान समझाते रहे। आज महसूस हो रहा है कि वो सब बेकार था। कोई कुछ नहीं सीख पाया। इतना कुछ करने के बावजूद हिंदू, हिंदू रह गया। मुसलमान, मुसलमान रह गया। कोई इंसान नहीं बन पाया। डॉक्टर कलाम को महान मत कहो। वो न तो खुद अच्छे छात्र बन पाए। न ही अच्छे गुरू बन पाए।

डॉक्टर कलाम अगर महान होते तो लोगों को उनका बताया रास्ता याद रहता। उन्होंने किस रास्ते आगे बढ़ने को कहा यह याद रहता। लेकिन लोगों को वो कुछ याद नहीं है। लोग तो उस रास्ते में उलझ गए, जिसके दोनों छोर पर लोहे के बोर्ड पर मोटे-मोटे अक्षरों में किसी मरे हुए हिंदू या मुसलमान का नाम लिखा रहता है। उस बोर्ड पर लिखे नाम को पढ़कर उसकी महानता की व्याख्या होती है।

सुना है कि किसी द्वीप का नाम बदल दिया गया है। उस पर भी डॉक्टर कलाम चस्पा कर दिए गए हैं। ये सड़क। ये द्वीप सब जगह से हटा दो डॉक्टर कलाम का नाम। ये सब डॉक्टर कलाम के लायक नहीं है। ये चिढाता है। इस पर हो रहे सियासी संग्राम में कौन जीत रहा है पता नहीं। किस पार्टी को, किस नेता को फायदा होगा पता नहीं। लेकिन हार रहे हैं डॉक्टर कलाम। जिन्होंने इंसानियत का पाठ पढ़ा। वही लोगों को भी सिखाया। लोगों को सपना देखना सिखाया। लेकिन सपना देखकर बड़े बनने के चक्कर में लोग डॉक्टर कलाम का सिखाय भूल गए।

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

स्वभिनाम रैली का सच

पटना की स्वाभिमान रैली में महागठबंधन का एजेंडा बहुत हद तक साफ हो गया। लालू यादव की सियासत 360 डिग्री घूमकर दो दशक पीछे पहुंच गई। वो फिर से जाति पर अटक गए। तो नीतीश कुमार अपने डीएनए को बिहार से जोड़ते-जोड़ते व्यक्तिगत हो गए।

लालू यादव ने अपने भाषण की शुरुआत ही दो जातियों के बीच लकीर खींचते हुए की। अनंत सिंह के बहाने उन्होंने यादवों को साधने की कोशिश की। तो जाति जनगणना को लेकर उन्होंने सवर्णों को टारगेट किया। तकरीबन आधे घंटे का उनका भाषण मंडल के ईर्द-गिर्द घूमता रहा।

दरअसल जाति की राजनीति के माहिर खिलाड़ियों को लगने लगा है कि मोदी के चक्रव्यूह को जाति के तिलिस्म से ही तोड़ा जा सकता है। नीतीश कुमार भी जानते हैं कि लालू यादव से गठबंधन के बाद उनका सवर्ण वोट छिटक गया। ऐसे में जो बातें अंदरखाने चल रही थी, वो गांधी मैदान के मंच पर सरेआम हो गई। लालू यादव की जातिवादी सियासत को शरद यादव का भी समर्थन है और खुद को विकास पुरूष कहने वाले नीतीश कुमार का भी।

लालू यादव जानते हैं कि यादव ही उनकी शक्ति हैं और यादव ही डर भी। जिन यादवों के भरोसे वो 15 बरस तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहे, वही यादव उनसे धीरे-धीरे छिटकते चले गये। लोकसभा चुनाव में काफी हद तक मोदी ने उनके यादव वोटबैंक में सेंघमारी की। तो अब पप्पू यादव गोप के नए पोप के तौर पर खुद को साबित करने में जुटे हुए हैं। जो लालू यादव के लिए बड़ी चिंता की बात है। और यही चिंता उन्हें बार-बार यादवों को दुहाई देने के लिए मजबूर करती रही।

जनता परिवार बनाने में नाकाम रहे महागठबंधन के नेताओं को लगता है कि अगर इस बार चूक गए तो बहुत कुछ खत्म हो जाएगा। लालू यादव खुद चुनाव लड़ नहीं सकते और पार्टी भी हार गई तो पूछेगा कौन। तो वहीं नीतीश कुमार इस चुनाव को आन की लड़ाई मान चुके हैं। कैडर की कमी से जूझते नीतीश कुमार को ये डर सता रहा है कि इस बार अगर सत्ता से दूर हो गए तो पार्टी को टूट से कोई बचा नहीं सकता है। ऐसी स्थिति में खुद हाशिए पर चले जाएंगे।

यही वजह है कि मोदी से सीधे-सीधे टकरानेवाले नीतीश कुमार डीएनए वाले बयान पर मोदी को घेरते-घेरते चूक गए। उन्होंने बड़ी चालाकी से खुद के डीएनए को बिहारियों के स्वाभिमान से तो जोड़ दिया लेकिन अंदर की बौखलाहट उन्हें व्यक्तिगत बना दिया। नीतीश कुमार का भाषण डीएनए में फंसकर अटक गया। उन्होंने मोदी के खानदान पर सवाल उठा दिए। उनकी विकास की राजनीति पीछे छूट गई।